सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

यह समय नहीं है

अभी मुझे बहुत दूर तक जाना है 
इसी प्रक्रिया में अनदेखे हो सकते हैं 
मेरी आंखों से कुछ रंग फूलों के
कुछ रंग तितलियों के

पर यह समय नहीं है 
मेरे मन को खुबसूरत परिवेश 
मे जीने के लिए छोड़ देने का
 मैंने नहीं तय किया है 
अभी तक आधा रास्ता भी 
उस अन्याय के खिलाफ 

जहां मौजूद हैं चीखे 
रेगिस्तान के रेत में दफन बच्चियों की 
प्रसव के दौरान मरे हुए स्त्रियों की 
हाथों से किताबों को उतारकर 
चढ़ाई गई मेहंदी की

मन का गणित जो बिगड़ गया हैं 
अब तक और भविष्य में 
संभावनाओं के नाम पर मौजूद हैं
 सरकारी दस्तावेजों पर केवल
 कुछ हस्ताक्षर ही 
ऐसे समय में देह के गणित का
मैं कहां तक सोच सकती हूं ?

टिप्पणियाँ

  1. वाह!गज़ब लिखा सराहनीय सृजन।
    जहां मौजूद हैं चीखे
    रेगिस्तान के रेत में दफन बच्चियों की
    प्रसव के दौरान मरे हुए स्त्रियों की
    हाथों से किताबों को उतारकर
    चढ़ाई गई मेहंदी की... हृदय को छूते भाव।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जिस दिन

जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

क्षणिकाएं

1 मैं उम्र के उस पड़ाव पर तुमसे भेंट करना चाहती हूं जब देह छोड़ चुकी होगी देह के साथ खुलकर तृप्त होने की इच्छा और हम दोनों के ह्रदय में केवल बची होगी निस्वार्थ प्रेम की भावना क्या ऐसी भेंट का  इंतजार तुम भी करोगे 2 पत्तियों पर कुछ कविताएं  लिख कर सूर्य के हाथों  लोकार्पण कर आयी हूं  अब दुःख नहीं है मुझे  अपने शब्दों को  पाती का रुप  न देने का  ना ही भय है मुझे  अब मेरी किताब के नीचे  एक वृक्ष के दब कर मरने का 3 आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे 4 कितना कुछ लिखा मैंने संघर्ष की कलम से समाज की पीठ पर कागज की देह पर उकेरकर किताबों की बाहों में  उन पलों को मैं समर्पित कर सकूं इतने भी  सकुन के क्षण  जिये नहीं मैंने 5 मेरी नींद ने करवट पर सपनों में दखलअंदाजी  करने का इल्जाम लगाया है