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एक थी कावेरी

               पागल से अस्त-व्यस्त बालों वाली कावेरी बचपन से जवानी तक और उसके आगे भी बोझ होने का बोझ उठाते रही । निसंतान चाची के पास छोड़ दिया तो बचपन उस धरती पर  गुजरा कावेरी का  जिस धरती पर कभी बीज अंकुरित नहीं हुआ था । चाची से तो ममता नहीं मिली पर हां जीवन का गणित जरूर सीख लिया । जिस दिन डांट पड़ती उस दिन उसके बाल नहीं बनते और नन्हे हाथों से कावेरी अपने बाल सवारती  स्कुल पहुंचने में देरी होती अगर गणित के अध्यापक कक्षा में होते तो खूब धुलाई होती । वैसे भी कावेरी को गणित और गणित का मास्टर दोनों यमराज से लगते ।  जबरदस्ती पहले बैंच पर बिठाया जाता और जिस दिन बोर्ड के तरफ उसकी सवारी गणित के अध्यापक  कक्षा में निकालते उस दिन बच्चे खूब हंसते और शर्म से गडी गडी कावेरी बगीजे के आम के नीचे बैठकर खूब रोती वो सीखना चाहती थी पर सिखाएगा कौन यह सवाल था ।
             बस्ती की लड़कियां भी कावेरी से चिकनी चुपड़ी बातें करके अपना काम निकलवा लेती कभी कावेरी से कलसी में पानी भर कर लिया जाता तो कभी आंगन में गोबर लिपकर लिया जाता बस कावेरी को किसी ना किसी का साथ चाहिए होता खूब हुड़दंग मचाती बस्ती में लड़कियों के साथ खेलते-खेलते कभी देर हो जाती फिर से चाची की डांट खाती कभी-कभी डांट खाते खाते रोते-रोते सो जाती और अगले दिन फिर से डांट कल का खाना खराब हुआ अगर खाना नहीं खाना था तो बोल देती बस बचपन गुजर रहा था ।
                तीज त्योहारों पर कभी-कभी मां आकर चली जाती उसे आज भी लाल गाड़ी देखते ही अजिब सी सिहरन होती है उसे अच्छा नहीं लगता क्यु कि पहली बार मां जब उसे चाची के पास रखने आयी थी इसी लाल गाड़ी में चढ़कर चली गई थी और उस दिन सूरज के अस्त होने तक आंसुओं की एक धारा उसके गालों पर से बहती रही थी  और जिस दिन मां के आने का दिन होता कावेरी दो चार घंटे पहले ही सड़क पर आंखें गड़ाए रहती सड़क पर दूर से कोई दिखाई देता उसे लगता उसकी मां है पर जैसे-जैसे करीब आता वह मन में कहती ये तो लंबी है मेरी मां नहीं है और कोई आता  दिखाई देता नजदीक आते-आते उसको लगता ये तो पतली है मेरी मां नहीं है इस तरह से  पूरा दिन इंतजार करती कभी  उसकी मां आती कभी उसकी मां नहीं आती ।
              चौथी पांचवी कक्षा में पहुंचते-पहुंचते घर का सारा काम उसे आने लगा खाना बनाना खेती का काम गोबर के उपले बनाना  सब कुछ करने लगी थी वो बारा बजे स्कूल से आती और एक बजे तक खेती में बैठकर उपले थापती आधा गोबर तो उसके कपड़े पर ही लग जाता था । उसके कपड़े उसके शरीर से इतने बड़े होते थे कि बड़ी बहनों के कपड़े पहनती और बार-बार उस कपड़े को खींचते ऊपर नीचे करते-करते सारा गोबर उसके कपड़े पर लग जाता और बाद में घर आते ही  उसकी ये दशा देखकर चाची फिर डांटती आज भी गांव जाती हैं तो उस जगह को देखकर उसकी आंखें नम हो आती हैं छोटी सी काली सी मरियल सी एक लड़की खेती में गड्ढा निकालकर उसके अंदर गोबर डालकर पानी डाल डाल कर उपले थापने वाली लड़की उसे याद आते हैं ।
             चाची इतनी अनुशासन प्रिय थी कि हर गलती पर कावेरी को सजा तो मिलती ही  गुस्से में कहती पता नहीं बाप  क्या देखकर यहां पर बेटी को रखकर गया है मेरे घर में क्या कमाने वाला मर्द है जो मैं इसकी बेटी को दो वक्त का खाना खिला दू मैं ही तो खेती में उपजा चावल बेचकर दाल नमक लाती हूं ऊपर से और एक पेट में कैसे पालू आया और रख कर गया दहलीज पर कभी-कभी तो दस दस दिन तक चाची नाराज़ रहती।  कावेरी घर ना आने के बहाने ढूंढते रहती और किसी न किसी के बरामदे पर बैठी रहती देर तक......
            कुछ लोग समय के पहले ही पंख खोल देते हैं कावेरी का भी ऐसा ही हुआ समय के पहले ही बड़ी बनी जब खेलना था तब खेती में जाती उपले बनाते घर का काम करती नारियल के पेड़ को पानी देती जो नारियल के पेड़ उसने मुंह अंधेरे में उठकर बचपन में सींचे थे आज उसका एक नारियल भी उसके हिस्से बड़ी मुश्किल से आता है वगैरा-वगैरा और मरियल सी काली सी कावेरी की देह में जवानी ने दस्तक दे दी पहले से और अधिक  गुमसुम आवाज  धीमी चाल धीमी पर उसकी देह हर एक के आने जाने वाले की आंखों में खटकती कावेरी थोड़ा समझती  थोड़ा नहीं समझती हर समय कोई ना कोई उसके देह को ताकता रहता हंसी मजाक करता अगर वह स्नानघर में जाती तो पुरुषों की जवान लड़कों की आंखें उसका पीछा करती  इन सबके बीच वह बड़ी हो रही थी खुद को संभाल रही थी और धीरे-धीरे और अधिक शांत गुमसुम होने लगी  ‌।
           आज भी कावेरी को चाची का वो  देवघर याद आता है जिसमें कम से कम दस बारह तो भगवानों की फोटो लगी हुई थी । हर दोपहर और शाम को पूजा करती घंटों तुलसी की माला लेकर जप करते-करते नजाने मुंह के अंदर ही बड़बड़ाती शायद कोटि-कोटि भगवानों का नाम लेती । पता नहीं वह निसंतान चाची बाल विधवा उस ईश्वर से क्या मांगती होगी बल्कि आज कावेरी बिल्कुल चाची की तरह ही उसी स्थिति में जीवन की धारा में बह रही है । तो आज कावेरी सोचती हैं पता नहीं चाची  तब क्या मांगा करती थी क्या कावेरी के लिए मांगती थी तो फिर उसके हिस्से की खुशियां क्यों नहीं मिली क्यों आज कावेरी का जीवन भी बिल्कुल चाची के जीवन की राह पर निकल पड़ा है ।
         हां हो सकता है उसने मांगा होगा कावेरी के लिए एक वर ताकि वो इस बोझ को जल्दी से किसी और के कंधे पर रख सकें कम से कम बुढ़ापे के तो पहले पर वह भूल गए होंगी मांगना सुख कावेरी के लिए अगर वह मांगती थोड़ी छांव तो निश्चित ही शायद थोड़ा सा सुख उसके हिस्से भी आता वो दूसरी चाची बनने की राह पर नहीं होती जिसका जीवन संस्कार से तो पत्नी का है मन के अंदर जिसके एक प्रेमिका रहती हैं पर देह से वह बिल्कुल चाची की तरह विधवा है । आज कावेरी को भी अपने बप्पा पर से विश्वास कम होता चला जा रहा था । अगर सचमुच बप्पा होते तो क्या वह हर दहलीज से अपमानित होकर निकाली जाती जिसने हर रिश्ता  निष्ठा के साथ सम्मान के साथ अपनाया पर किसी भी रिश्ते में उसे कभी नहीं अपनाया जैसे बारिश की एक बूंद लंबे सफर को तय करके आती हैं और पाषाण पर गिरकर  लहूलुहान हो जाती है ।
           कावेरी हर दहलीज से निकाली गई है आज और सबने दी हुई यातनाओं की गठरी उठाकर चल रही हैं जीवन की मरुभूमि में आज इन तमाम लोगों से बहुत दूर कभी न लौटने के लिए कभी न लौटने के लिए । जिन्होंने कभी अपनी सोहलत से गर्भ में रखा या फिर किसी ने अपने मकसद से मांगल्य दिया या उस प्रेमी ने केवल सुविधा के अनुसार खाली समय को भरने के लिए प्रेम किया कावेरी ने सबको ढ़ोया आप हर एक की तरफ उंगलियों को उठाने के पहले ही उसने अपने शब्दों को और भावनाओं को मौन का जामा पहनाकर  अपनी तमाम इच्छाओं को सपनों को आप सब के स्वार्थ के भेंट चढ़ा दिया ।
      
         

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-04-2022) को चर्चा मंच       "अट्टहास करता बाजार"    (चर्चा अंक-4392)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    --

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  2. बहुत अच्छे से नहीं लिखा गया है। बांझ शब्द का उपयोग करना बताता है कि आप स्त्रियों के प्रति संवेदनशील थोड़ी कम हैं। समय बदल रहा है। आप भी बदलिए। कविता बेहतर लिखती हैं आप।

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  3. लिखा अच्छा है लेकिन स्पष्टता और होनी चाहिए।

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  4. जो सच कड़वा हो तो लेखन भी कड़वा ही होगा...
    भाव अंतर्मन को छू गये।

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