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चंद छोटी कविताएं

1.
हमेशा एक दरवाजा 
खुला रखना उन बेटियों के लिए 
जो कुए की तरफ मुड़ने के पूर्व 
मुड़ जाए उस घर की तरफ 
जहां दीवारों ने सहेज रखी हैं 
उनकी पहली किलकारी ।

2.

कुछ बिखराव समेटने के लिए
नहीं होते हैं ! ठीक उसी तरह
जहाज  डूबने के पच्छात
गहरे पानी में सालों साल
नमक के परतों तले 
बेजुबान पड़ा रहता है
कुछ बिखराव समेटने के लिए
नहीं होते हैं बस आंखों की
जमीन पर नमक की खेती
उगाते रहते हैं ‌।

3.
एक वृक्ष की देह जलाते समय
हम भूल जाते हैं 
उसके दिये सांसों का हिसाब
ठीक उसी तरह
एक स्त्री को
तकलीफों के बीच 
अकेला छोड़कर जब कोई 
अहसान फरामोशी कर जाता है
तब वो भूल जाता है
सृष्टि के निर्माण के लिए
उमड़ा उसके छाती का दूध ।

4.
हमने अमृत से सींचा
पर वह डसना नहीं भूले 
आज के जनजाति के 
सांप थे वे 
उनकी  सभ्यता के 
मायने अलग जो थे ।










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दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।