जिस दिन समाज का
छोटा तबका
बंदूक की गोलियों से
और तलवार की धार से
डरना बंद कर देगा ।
उस दिन समझ लेना
बारूद के कारखानों में
धान उग आएगा
बलिया हवा संग चैत गायेगी ।
बच्चों के हाथों से
आसमान में उछली गेंद पर
लड़ाकू विमान की
ध्वनियां नहीं टकराऐगी ।
जिस दिन समाज का
छोटा तबका बंदूक
और तलवार की भाषा को
अघोषित करार देगा ।
उस दिन एक नई भाषा
का जन्म होगा
जिसकी वर्णमाला से
शांति और अहिंसा के
नारों का निर्माण होगा ।