देहातों में औरतें
गूंगी रखी जाती हैं
होती नहीं
सवाल पूछने की
हिम्मत नहीं करती है
और पूछने पर
रक्त बहती नदी
पीठ में उगाकर
कोने में पड़ी रहती हैं
उनकी हुंकार सुनकर
रात ओंस के बहाने
आंसू बहाती हैं
शहरों में आते-आते
यह स्थिति बदल जाती हैं
यहां सवाल पूछने पर
पीठ पर निशान नहीं
उग आते हैं
पर आत्मा को
छलनी छलनी कर
छोड़ा जाता है
रात के अंधेरे में
यह कोई हुंकार
नहीं निकलती हैं
बस शहर की औरतें
सारी रात अपने अंदर
सोक लेती हैं और
बेजुबान बना
दी जाती है
रोज थोड़ा थोड़ा
जहर पीकर
मृत्यु की ओर
प्रस्थान करती हैं
देहात में पीठ पर
जख्म छोड़े जाते हैं
तो शहर में आत्मा
पर घाव दिए जाते हैं