प्रेम हमेशा परोसा गया मुझे
अपमान की थाली में
आसमान की तरफ इशारा करके
मेरे पंखों को कसके पकड़ा गया
मेरी हथेलियों पर नमक रोपकर
मुझे मुस्कुराने की हिदायत दी गई
तरसती रही प्रेमी की एक आवाज के लिए
अनगिनत मौसमों के बीतने के बावजूद भी
बंजर भूमि मै तब्दील होती गई
हर उत्सवों ,त्यौहारों में मैं
तुम सब के बेवफाई का
बोझ अकेले ढो़ती गयी
धीरे-धीरे अपनी
उम्मीदों ,सपनों और श्रंगार को
अपने तन-मन से उतारती गई
ह