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दिन -2


नवरात्रि के नौ दिन नौ कविताएं - 
दिन 2

मंदिरों में सजाया गया मुझे 
पर क्या घर आंगन में 
उतनी ही सहजता से 
क्या स्वीकारा गया है  मुझे
 गर्भ से लेकर श्मशान तक 
कितनी कठिनाइयों को झेला 
पर इस रोष में कभी 
संसद पर ताला चढ़ाया है तूने ?

 देवालयों के गर्भगृह में 
सदा कीमती परिधानों से ढकी रही
पर धूल ,मिट्टी कूड़े  के बीच 
अपनी संतति की भूख बिनती 
कात्यायनी के फटे
वस्त्रो को  कभी  निहारा है तूने ?

नहीं ना 
तो सुनो 
मैंने उन तमाम दहलीज को लांघा हैं
जहां मैं मूर्तियों में रची बसी गयी
अब मैं रहती हूं उस अस्मिता के पीठ पर
छांव बन जहां झुलसती है रोटी 
उन बिस्तरों के सिलवटों  पर 
जहां औरत देह समझ नोची जाती है 
मैं बसती हूं उस कपाल के मध्य 
जहां बिंदी नहीं पसीना थकान बन बहता है

टिप्पणियाँ

  1. आपकी रचनाए हम लेजाते है
    और आप ब्लॉग तक भी नहीं आती
    अब तो लॉकडाउन भी नहीं है
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 10 अक्टूबर 2021 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं

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ईश्वर

ईश्वर  इन दिनों बीहड़ में बैठकर पाषाण पर लिख रहा है दस्तावेज सृष्टि के पुनर्निर्माण का उसके पहले वो छूना चाहता है जंगली जानवर के हृदय में स्थित प्रेम जिसका वह भूखा है सदियों से उसने खाली कर दी तमाम बैठकें जहां पाप के कीचड़ में पुण्यबीज बोने की इच्छाएँ जमा हो गई हैं  दिमागों को अंतिम आशीर्वाद देकर वो वहाँ से उठ चला है नदियाँ बीहड़ की तरफ मुड़ी हैं सुना है ईश्वर के चरणों के स्पर्श से बंधनमुक्त सांसें भर रही हैं  वनराई के सबसे ऊँचे तरू से बेल खींचकर ईश्वर ने पुरूषों के कदमों का माप लिया है कछुए के पीठ की कठोरता  उसने अपने कलम में भरकर  गढ़ ली है स्त्री की प्रतिमा।  तमस गुणों को नवजात के मुट्ठी में बंद करके ईश्वर ने बांध दिया है स्वार्थी मनुज को  दंन्तुरी मुस्कान में ।

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