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दिन -2


नवरात्रि के नौ दिन नौ कविताएं - 
दिन 2

मंदिरों में सजाया गया मुझे 
पर क्या घर आंगन में 
उतनी ही सहजता से 
क्या स्वीकारा गया है  मुझे
 गर्भ से लेकर श्मशान तक 
कितनी कठिनाइयों को झेला 
पर इस रोष में कभी 
संसद पर ताला चढ़ाया है तूने ?

 देवालयों के गर्भगृह में 
सदा कीमती परिधानों से ढकी रही
पर धूल ,मिट्टी कूड़े  के बीच 
अपनी संतति की भूख बिनती 
कात्यायनी के फटे
वस्त्रो को  कभी  निहारा है तूने ?

नहीं ना 
तो सुनो 
मैंने उन तमाम दहलीज को लांघा हैं
जहां मैं मूर्तियों में रची बसी गयी
अब मैं रहती हूं उस अस्मिता के पीठ पर
छांव बन जहां झुलसती है रोटी 
उन बिस्तरों के सिलवटों  पर 
जहां औरत देह समझ नोची जाती है 
मैं बसती हूं उस कपाल के मध्य 
जहां बिंदी नहीं पसीना थकान बन बहता है

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जनता और सत्ता

१) सिहासनों पर नहीं पड़ती हैं कभी कोई सिलवटें  जबकि झोपड़ियों के भीतर जन्म लेती हैं बेहिसाब   चिंता की रेखाएं  सड़कों पर चलते  माथे की लकीरों ने  क्या कभी की होगी कोशिश होगी  सिलवटों के न उभरने के गणित को  बिगाड़ने की।  २) सत्ता का ताज भले ही सर बदलता रहा राजाओं का फरेबी मन कभी न बदला चाहे वो सत्ता का गीत बजा रहा  या फिर बिन सत्ता पी रहा हाला ३) जिस कटोरे में हम अश्रु बहाते हैं  उसी कटोरे को लेकर हर बार हमारे अंगूठे का अधिकार मांगते हैं आजादी से लेकर अब तक  जो भी सत्ता की कुर्सी पर झूला है हमारे सांसों के साथ  वो मनमर्जी से हर बार खेला है सरिता सैल

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।

गर्भनाल की जमी

हमेशा एक दरवाजा  खुला रखना उन बेटियों के लिए  जो कुए की तरफ मुड़ने के पूर्व  मुड़ जाए उस घर की तरफ  जहां दीवारों ने सहेज रखी हैं  उनकी पहली किलकारी । चखने दो  उन्हें पुन्हा  उस नारियल का पानी  जिसकी जड़ को उन्होंने सिंचा था गुनगुनाते कोई फिल्मी गीत जीने की आस खत्म हुई उन बेटियों को  पुनः स्थापित करने दो संवाद  मां के आंचल के साथ  अलमारी में रखे उनकी  पुरानी चीजों के साथ  जिस पर आज भी मौजूद हैं  नन्ही उंगलियों से लेकर जवां हुए उनके हाथों का स्पर्श इतनी भर गुजारिश है मेरी  पितृसत्ता के पहरेदारों  बेटियों को वंचित ना करो उनकी गर्भनाल की जमी से