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प्रेम



प्रेम वो नहीं जो तुमने किया
अपनी सुविधा के अनुसार
बल्कि प्रेम वो था 
जो तुम्हारे पास समय की 
कमी के कारण
तुम्हारे आफिस की फाइलों में बंद रहा 
और मैं दिन महीने साल दर साल प्रतीक्षारत रही

अक्सर शाम चाय चढ़ाते समय
जब मैं तुम्हे पूछा करती थी 
आज कितनी बार चाय हो गई
तुम झूठ कहते थे हर बार
पर पूरे दिन की दिनचर्या में
जितनी बार तुम्हें याद करती
प्रत्येक बार एक बूंद चाय की 
तुम्हारे होंठ से मेरे होंठों तक का 
सफर तय करती

अलमारी में है आज भी खाली
लाल रंग की साड़ी की जगह 
जितने फिक्र से टटोलती थी 
तुम्हारा बटुवा 
उतनी ही बेफिक्री से
प्रत्येक बार मांगती थी तुमसे
हर त्यौहार में घुले रंग की भाँति
पहनी साड़ी सी
तुम्हारे प्रिय रंगों को बदलता देख 
मैं हर बार मुस्कुराती थी 
मन ही मन

प्रेम वह था जो मैंने 
अभावों में भी है जिया
तुम्हारे छोड़ कर चले जाने के बाद भी 
उपहार में तुम्हारे दिये हुए 
आंसुओं को  
तुम्हारी बदनामी के भय से 
कभी अपनी आंखों से बहने नहीं दिया 
यद्यपि हृदय से उठती हुंकार पर
हर बार मेरे होठों पर
विरह का एक *गीत* रख दिया
और मैने उसे ही अपना
जीवन का संगीत मान लिया

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क्षणिकाएं

1 मैं उम्र के उस पड़ाव पर तुमसे भेंट करना चाहती हूं जब देह छोड़ चुकी होगी देह के साथ खुलकर तृप्त होने की इच्छा और हम दोनों के ह्रदय में केवल बची होगी निस्वार्थ प्रेम की भावना क्या ऐसी भेंट का  इंतजार तुम भी करोगे 2 पत्तियों पर कुछ कविताएं  लिख कर सूर्य के हाथों  लोकार्पण कर आयी हूं  अब दुःख नहीं है मुझे  अपने शब्दों को  पाती का रुप  न देने का  ना ही भय है मुझे  अब मेरी किताब के नीचे  एक वृक्ष के दब कर मरने का 3 आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे 4 कितना कुछ लिखा मैंने संघर्ष की कलम से समाज की पीठ पर कागज की देह पर उकेरकर किताबों की बाहों में  उन पलों को मैं समर्पित कर सकूं इतने भी  सकुन के क्षण  जिये नहीं मैंने 5 मेरी नींद ने करवट पर सपनों में दखलअंदाजी  करने का इल्जाम लगाया है

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जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

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जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।