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क्षणिकाएं


नदी को समझने के लिए 
पानी होना पड़ता है 
और नदी किसी से 
उम्मीद नहीं करती हैं 
 ठीक उसी तरह  
छोडें हुये किनारों पर 
नदी वापस नहीं लौटती हैं

धूप सूखाने डाली थी मैंने पर 
मेरा गीला मन आसमान पे जा बैठा

मै ढोतीं हूँ अपने हिस्सें की धूप,अपनी पीठ पर
बाँधती हूँ थोडा सा संमदर अपने आँचल में
हौंसले की रेत अपनी मुट्ठी में
और उठाती हूँ, आसमान अपने कधों पर ।।


मौसम के बदलने का  फर्क
वहां नहीं पड़ता
जहां तन्हाई
बड़ी शिद्दत से
साथ निभाती हो

यात्रा मेरी जीवन सी, मिली
अवेहलना हर्ष-दुत्कार सभी
स्त्री  जीवन है ही ऐसी
हर भाव मुझे स्विकार अभी

टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 26 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. बहुत ही मारक क्षणिकाएँ..!!!

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  3. बहुत ही सुंदर हृदय स्पर्शी ।

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  4. वाह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

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