सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

प्रेम

प्रेम

तुम्हें मैं खोजती हूँ कँटीले पर्वत पर
नहीं मिलते तुम मखमली गलियारों पर 
तुम्हारे पैरों के छाले अक्सर बताते हैं
पहाडों बियाबानों का पता
नहीं मिलते हो तुम तालाबों झरनों के पास
तुम अक्सर दौडते हो रणभूमि के पास
कराह रहे हैं जहाँ कहीं कहीं सांसें

चाँद कि गोलायियों को नहीं नापते
तुम मेरे चेहरे की खूबसूरती से
ढूँढते हो तुम उसमें रोटी की विवशता को
और फिर पाती हूँ तुम्हें
मंदिर मस्जिद गिरजाघरों की सीढ़ियों पर
जहाँ दंतुरी मुस्कान भूख सह रही है पीढ़ियों से

जाकर खडी होती हूँ मै प्रथम मुलाकात के मोड पे
पर वहाँ नही पाती हूँ मैं तुझे
तुम होते हो किसी बुढी माँ के ओसारे पर
जहाँ सूरज कि प्रथम किरण से चाँद की शितलता तक
इन्तजार में रिस रही है बुढी आँखे
इन्हीं सबसे तुम्हें प्रेम है और तुम्हारे सब से मुझे प्रेम है ....

टिप्पणियाँ

  1. अच्छी कविता। प्रेम को कंटीले पर पर्वत पर नहीं मिलते हैं। वे आम ज़िन्दगी में मिलते हैं।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद सर
      आप की टिप्पणी मेरे लिए महत्वपूर्ण है

      हटाएं

  2. चाँद कि गोलायियों को नहीं नापते
    तुम मेरे चेहरे की खूबसूरती से
    ढूँढते हो तुम उसमें रोटी की विवशता को
    और फिर पाती हूँ तुम्हें
    मंदिर मस्जिद गिरजाघरों की सीढ़ियों पर
    जहाँ दंतुरी मुस्कान भूख सह रही है पीढ़ियों से
    बेहतरीन रचना

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

क्षणिकाएं

1 मैं उम्र के उस पड़ाव पर तुमसे भेंट करना चाहती हूं जब देह छोड़ चुकी होगी देह के साथ खुलकर तृप्त होने की इच्छा और हम दोनों के ह्रदय में केवल बची होगी निस्वार्थ प्रेम की भावना क्या ऐसी भेंट का  इंतजार तुम भी करोगे 2 पत्तियों पर कुछ कविताएं  लिख कर सूर्य के हाथों  लोकार्पण कर आयी हूं  अब दुःख नहीं है मुझे  अपने शब्दों को  पाती का रुप  न देने का  ना ही भय है मुझे  अब मेरी किताब के नीचे  एक वृक्ष के दब कर मरने का 3 आंगन की तुलसी पूरा दिन तुम्हारी प्रतिक्षा में कांट देती है पर तुम्ह कभी उसके लिए नहीं लौटे 4 कितना कुछ लिखा मैंने संघर्ष की कलम से समाज की पीठ पर कागज की देह पर उकेरकर किताबों की बाहों में  उन पलों को मैं समर्पित कर सकूं इतने भी  सकुन के क्षण  जिये नहीं मैंने 5 मेरी नींद ने करवट पर सपनों में दखलअंदाजी  करने का इल्जाम लगाया है

जिस दिन

जिस दिन समाज का  छोटा तबका  बंदूक की गोलियों से  और तलवार की धार से  डरना बंद कर देगा । उस दिन समझ लेना  बारूद के कारखानों में  धान उग आएगा बलिया हवा संग चैत  गायेगी । बच्चों के हाथों से  आसमान में उछली गेंद पर  लड़ाकू विमान की  ध्वनियां नहीं टकराऐगी । जिस दिन समाज का  छोटा तबका बंदूक  और तलवार की भाषा को  अघोषित करार देगा । उस दिन एक नई भाषा  का जन्म होगा  जिसकी वर्णमाला से  शांति और अहिंसा के नारों का निर्माण होगा ।

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।