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प्रेम का तर्पण

प्रेम का तर्पण

कब के बिछडे थे
बस रस्में बाकी हैं 
अब उनका समापन कर दूँ 
अपने सपने जो उलझे हैं
सुलझाकर वापस कर दूँ 
तनिक ठहर जाना  ।

बचपन की वो मीठी यादों से
नाता तोड़ के जाना 
यौवन की दहलीज से
नयनो को भी मोड़ के जाना 
तनिक ठहर जाना

संदूक खोल लूँ 
अर्पित कर दूँ फूलों की
अस्थियाँ
ज़रा जलार्पण कर दूं 
अश्रू जल से नहाये पत्र
तथा उसमें लुप्त वर्ण
समीर संग झुलाकर वापस कर दूँ 
तनिक ठहर जाना

जिन शब्दों और कदमों से
परिचय था हमारा
उनके मन को जरा
तसल्ली दे जाना 
तनिक ठहर जाना

बिछुड़ कर भी जो है पाना
हारकर भी जो है जीतना
आत्मा को अर्पण कर लूँ
साँसों का तर्पण कर लूँ
तनिक ठहर जाना ।

टिप्पणियाँ

  1. Bahut khoob likha hai
    https://yourszindgi.blogspot.com/2020/05/blog-post_29.html?m=0

    जवाब देंहटाएं
  2. साँसों का तर्पण कर लूँ
    तनिक ठहर जाना ।
    बढ़िया !

    जवाब देंहटाएं

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दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

जब वह औरत मरी थी

जब वह औरत मरी तो रोने वाले ना के बराबर थे  जो थे वे बहुत दूर थे  खामोशी से श्मशान पर  आग जली और  रात की नीरवता में  अंधियारे से बतयाती बुझ गई  कमरे में झांकने से मिल गई थी  कुछ सुखी कलियां  जो फूल होने से बचाई गई थी  जैसे बसंत को रोक रही थी वो  कुछ डायरियों के पन्नों पर  नदी सूखी गई थी  तो कहीं पर यातनाओं का वह पहाड़ था जहां उसके समस्त जीवन के पीडा़वों के वो पत्थर थे जिसे ढोते ढोते उसकी पीठ रक्त उकेर गई थी कुछ पुराने खत जिस पर  नमक जम गया था  डाकिया अब राह भूल गया था मरने के बाद उस औरत ने  बहुत कुछ पीछे छोड़ा था  पर उसे देखने के लिए  जिन नजरों की  आज जरूरत थी  उसी ने नजरें फेर ली थी  इसीलिए तो उस औरत ने  आंखें समय के पहले ही मुद ली थी ।