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संदेश

हत्यारे

हम मरते नहीं  मारे जाते हैं  सिद्धांत से खाली समय  और अवसरवादी भीड़ के हाथों तुम्हें क्या लगता है  मनुष्य आत्महत्या करता है  नहीं, ये शब्द केवल म्यान है  हत्या के ऊपर चढ़ाई हुई ।

औरत की जात बिकाऊ नहीं है

किसी औरत का प्रेम  दिहाड़ी समझकर  मत भोगना सामने से गुजरती हर औरत को देख तुम्हारी ये जो जुबान मोल-भाव की भाषा पर उतर आती है ना वेश्यावृत्ति एक धंधा है  औरत की जात बिकाऊ नहीं होती है  । 

इश्क़

इश्क़ तुम्हारे लिए बाजार था हमारे लिए ईश्वर का दरबार तुम भटक गए बाजार में हम ईश्वरीय हुए दरबार में

औरत

वो औरत थी उसकी वो जब चाहता अपनी मर्ज़ी से उसे अलगनी पर से उतारता इस्तेमाल करता और फिर वही ऱख देता  फिर आता फिर जाता जितनी बार उसे उतारा जाता उसके शरिर मे एक नस टूट जाती चमड़ी से कुछ लहू नजर आता जितनी बार उसे उतारा जाता उसके नाखुनों से भूमि कुरेदी जाती हर कुरदन जन्म देती एक सवाल  उसके आँखो का खा़रापानी जम जाता उसके घाव पे उसके लड़ख़डा़ते पैर रक्तरंजित मन उसकी लाचारी उसकी बेबसी उन्ह तमाम पुरूषो के लिये एक प्रश्न छोड़ जाती है औरत केवल देह मात्र है  ? 

कुछ कविताएँ

1. उस साल मेरे शहर में बहुत सी प्रतिमाओं का अनावरण हुआ था और उसी साल बहुत से बेघरों को उ न प्रतिमाओं के नीचे आश्रय मिला था 2. एका अरसे बाद मैं रेलवे स्टेशन पर गया पर मुझे ना तुम्हारे पास आना था ना ना तुम मेरे पास आ रही थी बस में इस आने जाने वाले खेल की यादों में फिर से एक बार डुब जाना चाहता था झूठा ही सही फिर एक बार में तुम्हें सच मानकर जीना चाहता था

वो एक शाम

उस शाम तुम गए फिर कभी नहीं लौटे न जाने कितने डूबते   सूरज मैंने जलभरी आंखों से विदा किये जाने कितनी रातों ने मेरी सिसकियों को अपने गर्भ में पनाह दी सूरज उगता रहा पर मेरे देहरी तक पहुंच ना पाए मैं उस शाम के दहलीज पर आज भी खड़ी हुं मानो एक युग से

हम अकेले जीते लोग

हम अकेले जीते लोग जिनसे समय ने तकदीर ने छीन लिया हमारे साथ चलते कदमों को और बहाल कर दिया है हमारे जीवन में रिक्तता हमारी हथेलियों को नहीं होता है कभी  स्पर्श किसी अन्य हथेलियों का ना ही हमारे हिस्से आती हैं वो सुबहे जिममें शामिल होता है किसी के जगाने का मुलायम स्पर्श न हीं देर रात तक दरवाजे पर टिके रहते हैं किसी के कदम हमारा इंतजार लेकर हम अकेले जीते लोग जो बेगुनाह होकर भी गुनहगार बन सबकी आंखों में प्रश्नचिन्ह बन जाते हैं त्योहारों के बाजार में हम खो जाते हैं लेकर अपना गम हम बस उतने ही जिंदा रहते हैं जितनी हमारे कंधों पर जिम्मेदारियों का वजन रहता है हमारे शौक हमारी पसंद नापसंद इसका ख्याल कोही नहीं रखता और एक दिन हम ही भूल जाते हैं हम क्या चाहते हैं क्या नहीं हम अकेले जीते लोग रात में करवट बदलने से भी डरते हैं तारों से भरे आसमान में धरा पर लेकर तन्हाई हम अपने आप से सिमट कर सोते हैं