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संदेश

जहाँ जन्मी तू

जहाँ जन्मी तु, शब्दों को बोली मिली खोल के पंख मैने,बगिया में फूल खिली । तुलसी लगाई मैंने पिता के अॉगन में जल अरपण किया पति के  प्रागंण में, जब जब तेरे उदर में अंश पला पति का वंश बढा  पर बाझपन का भार तुने  ही ढोया । अरपीत कर तुम जीवन अपना, सोच रही क्या पाया , क्या खोया । दरवाजे पे मेरे नाम का  तख्त न हुआ, फिर भी पूरा जीवन इसी  बेनाम घर को दिया । डाकिया कभी उसको ढूंढ कर नहीं आता, फिर भी हमको उसका , इन्तजार रहता । अनगिनत किरदारो में जीती  हुँ मैं , हर किरदार में किरायेदार  रहती मै ।

सम्मान का सिंदूर

उन्ह बदनाम गलियों में रोज शाम खडी होती है मजबुरी तलाशती है चुल्हे की आग गली के चौराहे पर खड़ी हो जाने से पहले वो खड़ी हो जाती है आईने के सामने लेकर अपना  जख्मी देह तथा रक्तरंजित मन करता है आईना भी कभी कभी बेईमानी दिखता है उस औरत को आवरण के पीछे का अश्क  वो मुँद लेती है आँखे और तलाशती है खुद को तभी समय का काँटा चुभ जाता है आँखो में प्रहरा कर जाता है आंतो पे आँखो को खोलकर  बंद करती है काजल से वो मार्ग जहाँ से अभी अभी उसने की थी कोशीश खुद को तलाशने की ग्राहक उसके होंठो को रोज रंगाता है कालिख से रोज वो उसे लेप देती है पिढा की लाली से वो सजाती है अपने माधे प्रेम रहित लाल बिंदी और तलाशती है रोज खाली डिब्बीं में थोडा सिदूंर सम्मान का

मछली बाजार की औरतें

मछली बाजार की औरतें  जब भी मैं  जाती हूँ मछली बाजार  एक आदत सी बनी है उन औरतों को निहारती हूँ  देखती हूँ मछली बेचने का कौशल  पल में सोचती हूँ  चंद पैसों के लिए  सुबह से शाम लगाती  हांक ये बैठती हैं ये  बाजार में  मैं सोचती हूँ  अगर ये न होती  इनके मर्दो की सारी मेहनत  सड़ जाती गल जाती  जो अभी है समंदर के लहरों से लड़ता हुआ  लाने को नाव भर  मछलियां  एक मछली वाली है इन्हीं में  सूनी है जिसकी कलाई मांग भी सूना है  गांव की तिरस्कृत पगडंडी की तरह  चेहरा थोड़ा काला कुरूप सा लेकिन मेहनत के  रंग से  दीप्त  उसके  श्रम को सलाम है मेरा जिसका  पुरूष समंदर से लड़ते हुए  लौटा नहीं कभी लेकर मछलियां  मेरे सामने से  गुजरते हैं हजारों चेहरे  नित्य केशों में सफेद फूल बांधते  नथनी , बिंदी  और पायल से सजी   और  स्निग्धता से  भरी ये मछली  बेचती  औरतें  हर रात अपना श्रंगार  समंदर के लहरों के भरोसे ही तो करती होंगी  जि...

आवो कुछ क्षण के लिए

आओ तुम कुछ क्षण के लिए  वहीं जायेगे कुछ पल के लिए मिलीं थीं जहाँ नजरों से नजरें एहसासों का हुआ था प्रथम मिलन हुआ था जहाँ से भविष्य के सपनों का संचरण ज़रा सा भी व्यथित ना होना तुम लौट जाना फिर से अपनी दुनियां में  साथी आज अन्तर हो चुका है   भूत और वर्तमान के बीच लोग ढूंढेगे उन पत्तो में  तुम्हारे दबे हुए कदमों को खोजेंगे समीर के बीच घुली हुई आवाजों को फिजाओं के उन फुलों में बसी हुई हमारी महक को और सावन की फुहारों मे   हमारा स्पर्श ढूंढेंगे आओ कुछ क्षण के लिए  तुम वहीं जायेगे  जहाँ से बिछड़े थे हम तुमसे हमेशा हमेशा के लिए....

दर्ज होंगे वो जख्म

दर्ज होंगे वो जख्म इतिहास के पन्नों पर दर्ज होंगे ये तमाम जख्म हिम की  घाटियों में जिस दिन  ऋषियों के कमंडल में पापियों ने खून भर दिया था उसी दिन मेरे देश का एक अंग सुन्न हो गया था दर्ज होंगे इतिहास के पन्नों पर सफेद भू पर रक्तवर्णी कमल जिस दिन एक नारी ने  बलात्कार के बाद अपवित्र करार दी गई देह.को प्रतिशोध की अग्नि में  जलाकर भस्म कर दिया था  उसी दिन धरती की बाँझ होने की प्रक्रिया आंरभ  हुई थी दर्ज होंगी इतिहास के पन्नों पर वो गीली चीखें आंसुओं से भरी जिस साल बीज बहे थे जलधारा में गद्दी पर बैठे राजा ने आश्वासनों को बांधकर  भेजा था कागज़ में जो मौसम की मार खाते-खाते किसानों तक पहुँचते - पहुँचते बह गया  लालच के तूफान में जब मुआवज़े की रकम को लिखते-लिखते टूट गई थी सरकारी बाबू की कलम दर्ज होंगे इतिहास के पन्नों पर चमगादड़ बन लटके किसानों की लाशें दर्ज हो जायेगी वो घटनाएँ जहाँ सवाल गूंगा बना था जवाब चाटुकारिता करते-करते गधों के पैरों में लेट गया था दर्ज  होगी वो रकम भी जो संसद की दीवारों की मरम्मत के लिए लगी थ...

क्षणिकाएं

१ नदी को समझने के लिए  पानी होना पड़ता है  और नदी किसी से  उम्मीद नहीं करती हैं   ठीक उसी तरह   छोडें हुये किनारों पर  नदी वापस नहीं लौटती हैं २ धूप सूखाने डाली थी मैंने पर  मेरा गीला मन आसमान पे जा बैठा ३ मै ढोतीं हूँ अपने हिस्सें की धूप,अपनी पीठ पर बाँधती हूँ थोडा सा संमदर अपने आँचल में हौंसले की रेत अपनी मुट्ठी में और उठाती हूँ, आसमान अपने कधों पर ।। ४ मौसम के बदलने का  फर्क वहां नहीं पड़ता जहां तन्हाई बड़ी शिद्दत से साथ निभाती हो ५ यात्रा मेरी जीवन सी, मिली अवेहलना हर्ष-दुत्कार सभी स्त्री  जीवन है ही ऐसी हर भाव मुझे स्विकार अभी

बूढ़ा वृक्ष

मोचीराम हाट के शोरगुल बीच सदियों से  खड़ा मैला कुचैला खुरदरा वो बूढ़ा वृक्ष न जाने आँखो में  है किसका इंतजार नित लौटती  दूर तक जाकर उसकी निगाहें  निराश मन से निहारता वो मटमैले पैरों पे पुराना पर  आज भी जीवित मोचीराम का खुरदरा स्पर्श पहली बार जिस दिन ठोकी  गयी थी उसपर मोटी सी कील लटकाने थैली  क्रोध से बड़बड़ाया था वो बूढ़ा वृक्ष  मोचीराम नित थैली लटकाता नित औजा़र सजाता न लटकती जिस दिन थैली  वो दिन बडा़ उमस भरा गुजरता पुराने नये कितने ही जूते जितनी सलवटें होती थी चेहरे पर दरारें भी उतनी ही  जूते में नजर आती थी क्षण भर में उग आते थे जूतों के अनगिन चेहरे मोचीराम के हाथ  काले पीले लाल मिट्टी से सने हुए काँटों से छीले गरमी से झुलसे पत्थरों ने टोंके से  बरसात ने भिंगोए असमय टूट से चलते चलते मालिक से रूठे से  जूते हाथ में लेता नब्ज़ पकड़ कर दाम बताता कर्म में फिर से रत हो जाता  यदा कदा सिक्कों की खनक से खुरदरे हाथों में मुलायम एहसास होता जब चढ़ते जूते फरमा पर   मोचीराम के हाथ पहचान जाता जूते का दर्द शामिल हो जाती थी...