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संदेश

अनाथ अनाथ के हिस्से आता रहा हमेशा बचा हुआ प्रेम, रिश्ते, रोटी ठीक उसी तरह होती है उसकी स्थिति चौराहे पर नजर उतारकर रखे सामान की  तरह मानो दहलीज को बचाया गया हो किसी काले साये के आने से गर्भ की नाल कटने के बाद भी दरबदर वो घूमता है ढूंढने उस नाल की नमी अनाथ टूटे वृक्ष की तरह आसमान की तरफ ताकता रहता है दो बूंद स्नेहसिक्त वर्षा के लिये सतत अपनी पीठ पर ढोता है मरे हुये रिश्ते का पाषाणी अवशेष बाहर का शोर ऊंचे से ऊंचा हो तो भी नहीं दे पाता है मात उसके मन के अंदर के खालीपन को उसकी उम्र कपास की तरह दौड़ती है और पर्वत जैसा भार सहती है दर्द की थैली पर रख देता है वो एक बोरी मुस्कान और बाँटता रहता है शहंशाह की तरह
पहली बारिश में ------------------------------ निहार रही थी मै उसे अपनी खिड़की से लोहे की सलाखों के पीछे से ठीक उसी समय और एक बारिश शुरू होती है मेरी स्मृतियों में जिसमें भीग रहा है मेरे बचपन का गाँव पोखरों में उछलती मछलियां भर रही है मेरे मन को खोल रही है गिरहों को मिट्टी की  देह से उठती सुगंध ओसरे पर बैठी बूढ़ीं आँखे आँगन किनारे लगे पौधे बूंदों के संग रोम रोम खिलखिलाते इठलाते पहली बारिश की बूँदें भिगों जाती हैं सबकुछ पहली बारिश में बुझ जाती थी प्यास गाँव के एकलौते कुँऐ की बच जाता था बेचारा अस्मिताओं के अभिशाप से वह भर जाता है उत्साह से बुझाने औरों की प्यास रात का सन्नाटा घने बादलों का साया उसे चीरती मेंढ़को की ध्वनियाँ खेती के सीने पर बढ़ती जलधारायें उसके संग अँकुरित बीज जो भर रही है आस मिटा  रही है चिंता की रेखा़यें टूटे छतों के नीचे सुस्ताते किसानों के मन मस्तिष्क में पहली बारिश में बदल जाता है रंग चेहरों का स्मृतियों का उम्मीदों का पहली बारिश में।  
पिढा़ से गुजरती एक औरत वो औरत थी उसकी वो जब चाहता अपनी मर्ज़ी से उसे अलगनी पर से उतारता इस्तेमाल करता और फिर वही ऱख देता फिर आता फिर जाता जितनी बार उसे उतारा जाता उसके शरिर मे एक नस टूट जाती चमड़ी से कुछ लहू नजर आता जितनी बार उसे उतारा जाता उसके नाखुनों से भूमि कुरेदी जाती हर कुरदन जन्म देती एक सवाल को उसके आँखो का खारापानी जम जाता उसके घाव पे उसके लड़ख़डा़ते पैर उसके रक्तरंजित मन उसकी लाचारी उसकी बेबसी उन्ह तमाम पुरूषो के लिये एक प्रश्न छोड़ जाती है औरत केवल देह है ???
रंग कितने ही किस्म के होते हैं रंग कुछ मिलते हैं बाजारों में कुछ समाये हैं हमारे किरदारों में बाजारों के रंग खुलेआम दिखते हैं किरदारों के रंग आवरण में छुपतें  हैं कितना सुंदर होता है मजदूरी के सिक्के का रंग कभी कभार बन जाता है ये क्रांति का रंग खून बन बहता है ये रंग क्योंकि भूख का रंग सबसे गाढ़ा होता है महानगरों के फ्लायओवर के नीचे चेहरें पर जमे होते हैं बेहिसाब रंग जो दाँत निकालकर हँसते हैं उजाले में अंधकार में घाव बन रिसते हैं चुनावी मौसम के भी होते हैं अपने रंग जो लफ़्ज़ों में इन्द्रधनुष बन फैलतें हैं कार्यों में रोगी बन अलसाते हैं पर हम सब बेखबर है उस रंग से जो धीरे-धीरे गायब हो रहा है जड़ों से जो हरियाली बन खिलखिलाता था पिला बन नवोंडी जैसा शरमाता था उत्सव बन खलियानों में झुमता था किसानों के हाथ से छुट रहा मिट्टी का रंग तरसती है हवाएँ सुनने के लिए, चैत के गीतों का रंग जिस दिन ये रंग हो जायेगा नदारत उस दिन हमारी अंतड़ियों का रंग पड़ जायेगा धीरे-धीरे नीला और हवाएँ बन जाएगी जहरीली... अग्निधारा प्रतिशोध की.
इम्तहान लेती है जिन्दगी जीवन से मृत्यू तक के सफर में पर्चे भर देते हैं हम उम्मीदों के स्याही से ओढकर कल्पनाओं के पंख हो जाते है हम खड़े संघर्ष के पर्वतों के नीचे पाना होता है हमें चोटी पर खिला हुआ ईच्छारूपी पुष्प इम्तहानों के दौर में रोपने होते है हमें शिला रूपी धरा के अतंस तले बीज भविष्य रूपी तरू का फलो के हर्ष का उत्साह मनाया ही कब हमने चींटी के कतार सम प्रश्न उत्तर की तलाश मे हम यूँ इम्तहानों के दौंड मे शामिल होते हैं हम तुम। कावेरी
सियासत गुलामी मे उतना ही बोला जाता हैं जितना नेता को भाता हैं बाकी शब्दों को जेब के अंदर जबरन ठूसा जाता हैं
तुम्हारा इंतजार मै कर रही हूँ तुम्हारा इंतजार चाँद के गलने से लेकर सूरज के ढलने तक बंसत कि हर नयी पत्तियों  पर लिख देती हूं तुमे चिट्ठियाँ पत्ते झड़े अनगिनत मौसम बीते अब मेरे शहर के हर वृक्ष के तले उग रही हैं तुमारे नाम कि दूब पहुँचा रही हैं हवा संग तुम्हें आने का संदेश काली नदी के तट बैठकर मैने बहाया हैं आँखों का काजल अब तो नदी का भी सीना भर गया है काले रंग से मछलियाँ बैठती है मेरे पास आकर और मूँद लेती आँखें मानो कर रही हैं प्रार्थनाऍ उस ईश से तुम्हारे लौटने की मैने तो भरे थे इस रिश्ते मे रंग प्रेम और सर्मपण के बेखबर सी थी मैं तुम्हारे मुट्ठी में बंद रंगो से तरसती है मेरे मकान की दहलीज तुम्हारे  तलवे के स्पर्श को फिर घर बन इठलाने को मंदिर के दिये तले है जमीं मिन्नतों की ढेर सारी मन्नतें तुम्हारा आना कुछ इस तरह से होगा जैसे घने बीहड़  में शहनाई का बजना किसी चंचल लड़की  के माथे सिदूंर का सजना