सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं


अनाथ


अनाथ के हिस्से आता रहा हमेशा
बचा हुआ प्रेम, रिश्ते, रोटी
ठीक उसी तरह होती है उसकी स्थिति
चौराहे पर नजर उतारकर रखे सामान की  तरह
मानो दहलीज को बचाया गया हो
किसी काले साये के आने से
गर्भ की नाल कटने के बाद भी
दरबदर वो घूमता है
ढूंढने उस नाल की नमी
अनाथ टूटे वृक्ष की तरह
आसमान की तरफ ताकता रहता है
दो बूंद स्नेहसिक्त वर्षा के लिये
सतत अपनी पीठ पर ढोता है
मरे हुये रिश्ते का पाषाणी अवशेष
बाहर का शोर ऊंचे से ऊंचा हो तो भी
नहीं दे पाता है मात
उसके मन के अंदर के खालीपन को
उसकी उम्र कपास की तरह दौड़ती है
और पर्वत जैसा भार सहती है
दर्द की थैली पर रख देता है वो
एक बोरी मुस्कान
और बाँटता रहता है शहंशाह की तरह

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

पितृसत्ता

समंदर ने पानी उधार लिया है  नदियों से  नदियां जब सूख रही होती हैं  समंदर नहीं लौटता है नदियों के हिस्से का जल !  समंदर न्याय नहीं करता  नदियों के साथ जैसे पिता नहीं करते न्याय अपनी  बेटियों से !