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वो लड़की



दुबली पतली-सी 
वो कमसिन काया उसकी 
देखा मैंने उसे मेले में
सजायी थी उसकी माँ ने 
चाकू छुरियों की दुकान
हर मेला घूमता 
एक कुनबा था उनका.... 

ग्राहक आते और चले   जाते 
अपरिपक्व बदन उसका
कितनी ही भेडिया नजरों को झेलता 
सोचा
निढाल पड़े थे सामने 
चाकू और छुरियां
शायद, रेंग रही थी भूख उन पर
बिना मालिक बेकार थे वो
गोया अंतडियां सहलाने का जरिया थे 

सहसा आया हवा का एक झोंका 
मेरी नज़र उसके उड़ते बालों पे टिकी
बंजर भूमि सा माथा उसका
कब की रूठ गयी थी वर्ष
उसकी धरा से
छोड दिया हो साथ
मिट्टी ने जड़ों का जैसे 
कुछ इस तरह से उभरी थीं नसें  
लड़की की देह में

आँखों में यौवन की चपलता पर
किनारों पर  मंडरा रही थी 
भूख की चिलचिलाती धूप
हँसती थी बेफिक्र सी हँसी
नहीं, उमड़ते गड्डे उसकी गालों में
पेट छिप जाता पीठ के अंदर

तन पर 
रंग बिरंगे मजहब का परिधान
पर रोटी के मजहब का रंग 
कुछ स्याह फीका सा है 
उसके चेहरे पर

कुनबा तय करेगा उनका
अनगिनत पड़ाव बाँध कर पैरों में
भूख प्यास और संघर्ष की पोटली
 क्या होगा भविष्य 
कबीले की इस जवान होती गुड़िया का
मढ़ दी जायेगी 
स्वार्थ की खूंटी से कहीं 
या बैठायी जायेगी
चाकू छुरियों वाले मेले के बाजार में 
या
लटक आए स्तनों को चूसते बच्चों के साथ...

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दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

पितृसत्ता

समंदर ने पानी उधार लिया है  नदियों से  नदियां जब सूख रही होती हैं  समंदर नहीं लौटता है नदियों के हिस्से का जल !  समंदर न्याय नहीं करता  नदियों के साथ जैसे पिता नहीं करते न्याय अपनी  बेटियों से !