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प्रहर



मेरा एकांत 
कमरे में छाये
सन्नाटे का हिसाब 
जब लगाता हैं 

तब इतिहास
अपने पन्नें खोलकर 
मेरे समक्ष आ बैठता हैं 

पर मेरी जिद्द होती हैं 
वर्तमान के लोहे सम 
कवच से मैं ढक दूं
उसके पन्नें

और घास पर बैठी
ओस की बूँदे भर लाऊँ
अपनी अँजुरी में ,

सींच दूँ फिर से 
एक और नींव भविष्य की 

तभी उस कमरे के 
सन्नाटे को चीर जाती हैं 
दीवार पर लगी घड़ी 
 संकेत देती हैं 
प्रहर के गुजर जाने का।

टिप्पणियाँ

  1. वाह! खूबसूरत सृजन...एकांत या अकेलापन?

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर सार्थक और भावप्रवण रचना

    जवाब देंहटाएं
  3. और घास पर बैठी
    ओस की बूँदे भर लाऊँ
    अपनी अँजुरी में ,

    सींच दूँ फिर से
    एक और नींव भविष्य की
    वाह!!!
    सकारात्मकता की ओर...
    बहुत सुन्दर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं

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