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सागर तट

बैठती मैं सागर तट अकेली
रेत का घर रोज बनाती
थकती नहीं मैं सदियों से
लहरे उसको रोज मिटाती
लहरे कहाँ रिश्ता निभाती
गुजर जाती एक पल में
छुकर उस प्रेमी के भाँति
जो छु जाता है
केवल एक अंश जीवन का
फिर भी तट पर मैं 
रोज अकेली बैठी रहती ।

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