सागर तट फ़रवरी 20, 2022 बैठती मैं सागर तट अकेलीरेत का घर रोज बनातीथकती नहीं मैं सदियों सेलहरे उसको रोज मिटातीलहरे कहाँ रिश्ता निभातीगुजर जाती एक पल मेंछुकर उस प्रेमी के भाँतिजो छु जाता हैकेवल एक अंश जीवन काफिर भी तट पर मैं रोज अकेली बैठी रहती । शेयर करें लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप शेयर करें लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप टिप्पणियाँ yashoda Agrawal20 फ़रवरी 2022 को 10:08 pm बजे आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 22 फरवरी 2022 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद! जवाब देंहटाएंउत्तरजवाब देंManisha Goswami20 फ़रवरी 2022 को 10:38 pm बजेबहुत ही खूबसूरत रचनाजवाब देंहटाएंउत्तरजवाब देंअनीता सैनी 20 फ़रवरी 2022 को 11:18 pm बजेवाह!बहुत सुंदर।सादर जवाब देंहटाएंउत्तरजवाब देंसुशील कुमार जोशी21 फ़रवरी 2022 को 6:14 pm बजेसुन्दर सृजनजवाब देंहटाएंउत्तरजवाब देंटिप्पणी जोड़ेंज़्यादा लोड करें... एक टिप्पणी भेजें
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 22 फरवरी 2022 को साझा की गयी है....
जवाब देंहटाएंपाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
बहुत ही खूबसूरत रचना
जवाब देंहटाएंवाह!बहुत सुंदर।
जवाब देंहटाएंसादर
सुन्दर सृजन
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