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समर्पण का गणित

समर्पण का गणित हमेशा
मेरे हिस्से ही क्यों ?
क्यों तुम्हें लगा 
बच्चों के नाम की बेडियां
मेरे पैरों में डालकर
स्वच्छंदता से तुम विचरते रहोगे 
बाजार समझ मकान में लौटोगे
जिसे घर बनाया मैंने
संघर्ष की तपती रेत पर चलकर
नहीं वे दिन कब के बीत गए
मंगलसूत्र का एक धागा
मांग में मौजूद थोड़ा सा सिंदूर 
गर्भ में रचा तुम्हारा अंश 
प्रमाण नहीं बनेंगे अब 
तुम्हारे स्वामित्व का 
तुम बेफिक्र घूमते रहे  
समाज ने दी सिख लेकर
औरत मां बनने के पश्चात 
दहलीज पार नहीं कर सकती 
पर अब बदलनी होगी 
इस सिख की परिभाषा 
अब रोपनी होगी मुझे ही
भविष्य के नवनिर्माण की अभिलाषा


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