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तुम्हारे इंतज़ार में

तुम्हारे इंतज़ार में तुम्हारे इंतज़ार में लिखना चाहती हूँ युद्ध के दस्तावेजों पर मेरा प्रेम तुम्हारे लिए जिससे मिट जायेगी युद्धों की तारीखें पिघल जायेगा औजारों का लोहा लहरायेगा हवा संघ शांति का परचम इंगित होगा जिसपर मेरा प्रेम तुम्हारे लिए तुम्हारे इन्तजार में मैं लिखना चाहती हुं रेगिस्तान की पीठ पर मेरा प्रेम तुम्हारे लिए जिससे पिघलेंगे विरह के बादल तपती रेत से निकलेगी एक नदी हो जायेगी तृप्त हर गगरी की देह गोद दूंगी पानी के ह्रदय में मेरा प्रेम तुम्हारे लिए तुम्हारे इन्तजार में मैं लिखना चाहती हुं मिट्टी में धंसे पंगड़डियों पर मेरा प्रेम तुम्हारे लिए और वहां बैठ  मैं गुनगुनाना चाहती हूं एक गीत वर्षा के आगमन का निराश किसानों की पुतलियां अंकुरित कर  धान की पातियो पर अंकित करुंगी मेरा प्रेम तुम्हारे लिए ह

कर दिया है तूम्हें मुक्त

मैं तुम्हे मुक्त कर रही हूँ इस रिश्ते की डोर से क्योंकि कई बार मैने महसूस किया है  तुम्हारी पीठ पर मेरे  अदृ्श्य बोझ को इन दिनों अधिक बढ़ गया है हम दोंनो के बीच  कदमों का फासला भी कोशिश करती हूँ  कह दूँ  तुम्हारे कानों में  वही प्रेम के मंत्र जो प्रथम मुलाकात में तुमने अनायास ही घोलें थे मेरे कानों  में और समा गये थे तुम मेरे रोम -रोम में मैं स्वार्थी तो थी ही पर थोड़ी बेफ़िक्र भी हो गई थी तुम्हारी चाहत मे दिन-रात तुम्हारे ही इर्द -गिर्द चाहती थी मौजुदगी  जब तुम तल्लीन हो जाते थे अपने कर्मो में मै रहती थी प्रयासरत अपनी मौजुदगी का एहसास  कराने को जब कभी पड़ता था  तुम्हारे माथें पर बल और सिमट जाती थी  ललाट की सीधी सपाट रेखाएं मैं रख देती थी धीरे से  तुम्हारे गम्भीर होंठो पर अपनी उंगलियों को मेरा रूठना तो सिर्फ इसलिए होता था कि मैं तैरती रहूँ तुम्हारे मनाने तक  तुम्हारी ही श्वास एवं प्रच्छवास की उन्नत होती तरंगों पर जिम्मेदारियों के चक्र में जब जम जाती थी थकावट की उमस भरी धूप और शिथिल पड़ जाती थी मैं तुम मुझे उभारते बिना हाथो...

चांद

नित्य मेरी बालकनी में मिलते हैं दो प्रेमी दृश्य अद्धभुत होता है रोज रात को चाँद निहारता है मेरी तुलसी को फिर होता है शुरू अठखेलियों का खेल, शिकायत तुलसी की चाँद से वो क्यों देर से आता है अक्सर प्रेम में इन मीठी शिकायतों का मर्म समझता है चाँद, मुस्कुराकर, तुलसी का श्रृंगार निहारता हैं चाँद पवन संग झुक जाती है तुलसी शर्माकर, बालकनी बैठकर अक्सर सोचती हूं दोनों की दुरी को नापने का करती हूँ विफल प्रयास, उनके मिलने का भी होता है मेरा अट्टाहास लगती है विफलता कई बार हाथ फिर भी, रोज आता है चाँद रोज शरमाती है तुलसी रोज एक नयी जुदाई नये मिलन के लिये। ह

पिता

पिता ! जैसे घर की नीव  में  अदृश्यता से स्थित पत्थर सहता है सम्पूर्ण भार जताये बिन श्रम निरंतर पिता ! मिट्टी में स्थित बीज बिन संतुलन खोये  बिना लोभ लालच स्थित विशिष्ट दूरी पर उर्जा पहुंचाता निरंतर पिता! जैसे बूढ़ा दरख्त  चमड़े जितना सख़्त रक्त जमा दे क्यू न शीत  सहता धूप तपिश निरंतर पिता ! रात के अंधयारे में थकी आंखें दीवार पे बच्चों की सपनों की उड़ान रेखती रहती निरंतर पिता  एक ऐसा वजूद जिसके घिसे  जूतों से निकलता है संतानों के अस्तित्व का मार्ग जिनका जीवन में होना सूरज सम उर्जा से भरता रहना निरंतर (पिता हमेशा पुरूष ही नहीं होता है मां भी पिता का दायित्व संभाल लेने की क्षमता रखती हैं)

कुछ इस कदर बिखर गये हम

कई बार बिखरी थी वो हर बार समेट लिया करती थी खुद को  एक सिलसिला सा बनता गया बिखरने और समेंटने का  पर इस बार  उसने नहीं समेटा खुद को  क्योंकि उस बिख़राव को  जीना चाहती थी वो चलना चाहती थी उसी राह पर जिन पगडंडियों पर गिरे थे  ह्रदय के अनगिन टुकड़े कदमों में चुभते थे  जो बार-बार शूल की तरह हर चुभन के साथ बहे जो आंसू  लाल रंग के वो बहायेगी उसे नदी में  और एक दिन बह उठेंगी  लाल खून सी लहरें सागर के सीने पर  जो कर देंगी सागर के  अस्तित्व को शर्मिंदा  आज वो नहीं समेटना चाहती हैं  बिखरे हुए दिन और रात  उलझते हैं जो कई-कई बार सूरज की प्रथम किरण को  भूली थी वह चुभती थी उसे चांद की शीतलता  रात लंबी होती थी  इसलिए दिन के उजाले को  नहीं चीर पाती थी वो नहीं समेंटना चाहती थी उसका बिखरा श्रृंगार इस बार  काजल मेघ बन फैलता आसमान में माथे की बिंदी में बचा था  केवल एक शून्य उसके होठों की मुस्कान  पी गया था भ्रमर धोखे से अपने गुंजन में करके उसे मुग्ध I

विरह

डुबोकर रक्त में तिनके  मै तुम्हारा विरह लिखती हूँ  जिन राहों पर साथ चलते चुभे थे पैरों में  कभी अपमान के कांटे तुम्हारे तिरस्कार के  तलवों में पड़े छालों से  पत्थरों पर उगे निशान मैं लिखती हूँ  रास्ते में पड़ते मंदिरों की चौखट में  बुदबुदाया करती थी मैं  तुम्हारे मुश्किलों की गांठें  उन कामयाबियों के  मन्नतों के धागे मैं लिखती हूँ  गोधूलि में लौटते   पक्षियों की थकान  जानवरों के पैरों में  लगे भूख के निशान  मेरे वापसी के सफर में  यातनाओं की वो गठरी  आँखों के किनारे पर  अपना साम्राज्य फैलाता  वह संमदर  और कुछ इस तरह से  तुम्हारी बेवफाई की पीठ पर  मै आज भी वफा लिखती हूँ

हो जाओ तुम मुक्त

उस व्यवस्था से तुम  हो जाओ मुक्त  जो छाँव देने के भरोसे के बदले  छीन लेती है तुम्हारी  स्वनिर्मित आशियाने की छत उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त  जो तुम्हारी हथेली पर खींच देती है एक रेखा  भाग्य के सिदुंर की  और छीन लेती है  तुम्हारी अँगुलियों की ताकत  उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त  जो तुम्हारे कंधों पर रख देती है हाथ जीवन भर साथ निभाने के  आश्वासन के साथ  और तोड़ देती है एक मजबूत हड्डी  तुम्हारे बाजुओं की उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त  जो तुम्हारे ह्रदय के गर्भ गृह में हो जाती है प्रेम से दाखिल  और तुम बसा लेती हो एकनिष्ठ एक ईश्वर की प्रतिमा  जिस दिन  तुम हठ करती हो एक कतरा उजाले की वो छीन लेती है  तुम्हारी आँखों की पुतलियाँ।