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संदेश

चांद

नित्य मेरी बालकनी में मिलते हैं दो प्रेमी दृश्य अद्धभुत होता है रोज रात को चाँद निहारता है मेरी तुलसी को फिर होता है शुरू अठखेलियों का खेल, शिकायत तुलसी की चाँद से वो क्यों देर से आता है अक्सर प्रेम में इन मीठी शिकायतों का मर्म समझता है चाँद, मुस्कुराकर, तुलसी का श्रृंगार निहारता हैं चाँद पवन संग झुक जाती है तुलसी शर्माकर, बालकनी बैठकर अक्सर सोचती हूं दोनों की दुरी को नापने का करती हूँ विफल प्रयास, उनके मिलने का भी होता है मेरा अट्टाहास लगती है विफलता कई बार हाथ फिर भी, रोज आता है चाँद रोज शरमाती है तुलसी रोज एक नयी जुदाई नये मिलन के लिये। ह

पिता

पिता ! जैसे घर की नीव  में  अदृश्यता से स्थित पत्थर सहता है सम्पूर्ण भार जताये बिन श्रम निरंतर पिता ! मिट्टी में स्थित बीज बिन संतुलन खोये  बिना लोभ लालच स्थित विशिष्ट दूरी पर उर्जा पहुंचाता निरंतर पिता! जैसे बूढ़ा दरख्त  चमड़े जितना सख़्त रक्त जमा दे क्यू न शीत  सहता धूप तपिश निरंतर पिता ! रात के अंधयारे में थकी आंखें दीवार पे बच्चों की सपनों की उड़ान रेखती रहती निरंतर पिता  एक ऐसा वजूद जिसके घिसे  जूतों से निकलता है संतानों के अस्तित्व का मार्ग जिनका जीवन में होना सूरज सम उर्जा से भरता रहना निरंतर (पिता हमेशा पुरूष ही नहीं होता है मां भी पिता का दायित्व संभाल लेने की क्षमता रखती हैं)

कुछ इस कदर बिखर गये हम

कई बार बिखरी थी वो हर बार समेट लिया करती थी खुद को  एक सिलसिला सा बनता गया बिखरने और समेंटने का  पर इस बार  उसने नहीं समेटा खुद को  क्योंकि उस बिख़राव को  जीना चाहती थी वो चलना चाहती थी उसी राह पर जिन पगडंडियों पर गिरे थे  ह्रदय के अनगिन टुकड़े कदमों में चुभते थे  जो बार-बार शूल की तरह हर चुभन के साथ बहे जो आंसू  लाल रंग के वो बहायेगी उसे नदी में  और एक दिन बह उठेंगी  लाल खून सी लहरें सागर के सीने पर  जो कर देंगी सागर के  अस्तित्व को शर्मिंदा  आज वो नहीं समेटना चाहती हैं  बिखरे हुए दिन और रात  उलझते हैं जो कई-कई बार सूरज की प्रथम किरण को  भूली थी वह चुभती थी उसे चांद की शीतलता  रात लंबी होती थी  इसलिए दिन के उजाले को  नहीं चीर पाती थी वो नहीं समेंटना चाहती थी उसका बिखरा श्रृंगार इस बार  काजल मेघ बन फैलता आसमान में माथे की बिंदी में बचा था  केवल एक शून्य उसके होठों की मुस्कान  पी गया था भ्रमर धोखे से अपने गुंजन में करके उसे मुग्ध I

विरह

डुबोकर रक्त में तिनके  मै तुम्हारा विरह लिखती हूँ  जिन राहों पर साथ चलते चुभे थे पैरों में  कभी अपमान के कांटे तुम्हारे तिरस्कार के  तलवों में पड़े छालों से  पत्थरों पर उगे निशान मैं लिखती हूँ  रास्ते में पड़ते मंदिरों की चौखट में  बुदबुदाया करती थी मैं  तुम्हारे मुश्किलों की गांठें  उन कामयाबियों के  मन्नतों के धागे मैं लिखती हूँ  गोधूलि में लौटते   पक्षियों की थकान  जानवरों के पैरों में  लगे भूख के निशान  मेरे वापसी के सफर में  यातनाओं की वो गठरी  आँखों के किनारे पर  अपना साम्राज्य फैलाता  वह संमदर  और कुछ इस तरह से  तुम्हारी बेवफाई की पीठ पर  मै आज भी वफा लिखती हूँ

हो जाओ तुम मुक्त

उस व्यवस्था से तुम  हो जाओ मुक्त  जो छाँव देने के भरोसे के बदले  छीन लेती है तुम्हारी  स्वनिर्मित आशियाने की छत उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त  जो तुम्हारी हथेली पर खींच देती है एक रेखा  भाग्य के सिदुंर की  और छीन लेती है  तुम्हारी अँगुलियों की ताकत  उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त  जो तुम्हारे कंधों पर रख देती है हाथ जीवन भर साथ निभाने के  आश्वासन के साथ  और तोड़ देती है एक मजबूत हड्डी  तुम्हारे बाजुओं की उस व्यवस्था से तुम हो जाओ मुक्त  जो तुम्हारे ह्रदय के गर्भ गृह में हो जाती है प्रेम से दाखिल  और तुम बसा लेती हो एकनिष्ठ एक ईश्वर की प्रतिमा  जिस दिन  तुम हठ करती हो एक कतरा उजाले की वो छीन लेती है  तुम्हारी आँखों की पुतलियाँ।

प्रेम

प्रेम वो नहीं जो तुमने किया अपनी सुविधा के अनुसार बल्कि प्रेम वो था  जो तुम्हारे पास समय की  कमी के कारण तुम्हारे आफिस की फाइलों में बंद रहा  और मैं दिन महीने साल दर साल प्रतीक्षारत रही अक्सर शाम चाय चढ़ाते समय जब मैं तुम्हे पूछा करती थी  आज कितनी बार चाय हो गई तुम झूठ कहते थे हर बार पर पूरे दिन की दिनचर्या में जितनी बार तुम्हें याद करती प्रत्येक बार एक बूंद चाय की  तुम्हारे होंठ से मेरे होंठों तक का  सफर तय करती अलमारी में है आज भी खाली लाल रंग की साड़ी की जगह  जितने फिक्र से टटोलती थी  तुम्हारा बटुवा  उतनी ही बेफिक्री से प्रत्येक बार मांगती थी तुमसे हर त्यौहार में घुले रंग की भाँति पहनी साड़ी सी तुम्हारे प्रिय रंगों को बदलता देख  मैं हर बार मुस्कुराती थी  मन ही मन प्रेम वह था जो मैंने  अभावों में भी है जिया तुम्हारे छोड़ कर चले जाने के बाद भी  उपहार में तुम्हारे दिये हुए  आंसुओं को   तुम्हारी बदनामी के भय से  कभी अपनी आंखों से बहने नहीं दिया  यद्यपि हृदय से उठती हुंकार पर हर बार मेरे होठों पर विर...

जहाँ जन्मी तू

जहाँ जन्मी तु, शब्दों को बोली मिली खोल के पंख मैने,बगिया में फूल खिली । तुलसी लगाई मैंने पिता के अॉगन में जल अरपण किया पति के  प्रागंण में, जब जब तेरे उदर में अंश पला पति का वंश बढा  पर बाझपन का भार तुने  ही ढोया । अरपीत कर तुम जीवन अपना, सोच रही क्या पाया , क्या खोया । दरवाजे पे मेरे नाम का  तख्त न हुआ, फिर भी पूरा जीवन इसी  बेनाम घर को दिया । डाकिया कभी उसको ढूंढ कर नहीं आता, फिर भी हमको उसका , इन्तजार रहता । अनगिनत किरदारो में जीती  हुँ मैं , हर किरदार में किरायेदार  रहती मै ।