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संदेश

रंग

बच्चों की रंगीन पेंसिल के बक्से से  एक रंग गायब हो रहा है रोज  हरा ,पीला, नीला , नारंगी  सभी ने अपनी सीमा तय करने के लिए  बांट लिए हैं आपस में बचपन में हम दो रंगों को  एक साथ मिलकर  एक नया रंग बनाते थे  पर आज ऐसी कोशिश  करार कर सकती है बच्चों को भी मुजरिम बच्चों की रंगीन पेंसिल के बक्से में से  गायब होते ये रंग मुझे ड़राते नहीं है  बल्कि मेरे बच्चों के जीवन से गायब होते ये रंग  मुझे आने वाले पीढ़ी के रंगहीन होने का संकेत देते है  क्योंकि मेरे बच्चों ने देखा है  ये दौर जिस दौर में रंगों के झंडे के  नीचे कितना खून बहाया है इसलिए मेरे आने वाली पीढ़ी  हो सकती है रंगहीन होने पर गर्व करे

मेरा गाँव

मेरा गाँव अब गाँव कम, खंडहर अधिक नज़र आने लगा है; हर दूसरे घर ने नींव को नंगा कर दिया है। ​खिड़कियाँ अंदर से बंद हैं, पर समय ने उन्हें बाहर से खोल दिया है; दरवाज़े पर ताला किसी बूढ़े के हाथ में लाठी की तरह पड़ा है। ​बचपन में जो घर मुझे विशालकाय लगते थे, अब मानो मरणासन्न हालत में किसी अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मरीज की तरह सिमट गए हैं। ​जिस कुएँ में एक साथ कई गगरियाँ नृत्य करती थीं, वह कुआँ आज मकड़ियों के जाल और कँटीली झाड़ियों के बीच, किसी की टोह के लिए प्यासा है। ​छोटी-छोटी पगडंडियों को न जाने कौन निगल गया, बिना कोई निशान छोड़े । ​नाग देवता का कच्चा पत्थर अब पक्का बन गया है, पर पक्का बनने पर भी वह वीरान और उजड़ा क्यों नज़र आ रहा है ? ​जो घर गिरकर मिट्टी हो चुके हैं, उन घरों की बुनियाद पर पड़े सिलबट्टे और टूटी तुलसी ने उनके 'घर' होने के संकेत आज भी बरकरार रखे हैं। ​एक गाँव को खंडहर बनाकर हम, फिर से एक और खंडहर बनाने की यात्रा पर निरंतर चल रहे हैं।

मछलियों का संसार

1 मछलियां समंदर की गहराई से डरकर सतह पर आती हैं और जाल की उतराई में फंस जाती हैं 2 समंदर के देश में मछलियां मरती नहीं है उनकी सामूहिक हत्या की जाती हैं मेरे देश की तरह उन्हें मुआवजा नहीं मिलता है हां मेरे देश की तरह वहां हत्यारे पुनः पुनः आ जाते हैं बेखौफ 3 मछलियों को जाल ने कभी फसाया नहीं उन्हें तो फसाया गया हमेशा से एक और मरी हुई मछली ने 

वो लड़की

दुबली पतली-सी  वो कमसिन काया उसकी  देखा मैंने उसे मेले में सजायी थी उसकी माँ ने  चाकू छुरियों की दुकान हर मेला घूमता  एक कुनबा था उनका....  ग्राहक आते और चले   जाते  अपरिपक्व बदन उसका कितनी ही भेडिया नजरों को झेलता  सोचा निढाल पड़े थे सामने  चाकू और छुरियां शायद, रेंग रही थी भूख उन पर बिना मालिक बेकार थे वो गोया अंतडियां सहलाने का जरिया थे  सहसा आया हवा का एक झोंका  मेरी नज़र उसके उड़ते बालों पे टिकी बंजर भूमि सा माथा उसका कब की रूठ गयी थी वर्ष उसकी धरा से छोड दिया हो साथ मिट्टी ने जड़ों का जैसे  कुछ इस तरह से उभरी थीं नसें   लड़की की देह में आँखों में यौवन की चपलता पर किनारों पर  मंडरा रही थी  भूख की चिलचिलाती धूप हँसती थी बेफिक्र सी हँसी नहीं, उमड़ते गड्डे उसकी गालों में पेट छिप जाता पीठ के अंदर तन पर  रंग बिरंगे मजहब का परिधान पर रोटी के मजहब का रंग  कुछ स्याह फीका सा है  उसके चेहरे पर कुनबा तय करेगा उनका अनगिनत पड़ाव बाँध कर पैरों में भूख प्यास और संघर्ष की पोटली  क्या होगा भविष्य...

चार बहनें

चार बहनें ब्याही गई चार दिशाओं में मिलने के लिए आना चाहती थी मायके की छत के नीचे ताकि बांट सके अपने संताप को और सुख के संदूक को  पर आ न सकी कभी इकट्ठी हर बार चूकती रही तारीखें  मिलने की त्योहारों में भी बंधे  रहे उनके हाथ ससुराल की खुटीं से जब वे उत्तरदायित्वों से बरी कर दी गई तब तक मायके के चूल्हे की आग शमशान की लपटों में तबदील हो गई थी  अब चार बहनों को नहीं बांटने होते हैं कोई सुख -दुख सुदूर से स्मरण करती है एक दूसरे की भूली बिसरी स्मृतियों को   सारे पुल टूटकर धाराशाही हो गए अब तो चार दिशाओं की दूरी मानो चार देशों में तब्दील हो गई है ।

औरतें

अच्छी औरतें छली गई और जिन औरतों ने विरोध किया बदला लिया वे औरतें गाली की तरह इस्तेमाल की गई इसलिए औरतों को थोड़ा कम अच्छा होना चाहिए ताकि  विरोध का थोड़ा रसायन घो लकर इस दुनिया को पिला सके समय-समय पर

प्रेम

महीने के अंतिम तारीख को वो अपनी प्रेमिका से अपना खाली बंटवा  भरने की जिम्मेदारी देता है प्रेमिका उसे प्रेम समझते हैं महीने के अंतिम तारीख को वो कुछ इस तरह से घर में राशन का जुगाड़ कर पता है और पत्नी उसे प्रेम समझती है

शिव

हर पार्वती के हिस्से नहीं होते हैं शिव फिर भी वो अर्धनारीश्वरी के  रूप में  विचरती है इस धरा पर 

विकट समय पर तुम्हारा जाना

समय बहुत विकट था लेकिन उतना भी कठिन नहीं था कि तुम भाग गए सबसे पहले जो रिश्तों के कतार में सबसे आगे होने का दावा करता रहा | मैं  बुरे समय के कारण नहीं मारी गई बल्कि इसलिए मारी गई थी मेरे हृदय  के गर्भ में जहां तुम्हारे लिए अनुराग का जन्म हुआ था उस हृदय के गर्भस्थली में भारी रक्तपात हुआ था उस दिन और मेरी देह क्षीणतर होती गई थी | समय बहुत कठिन था पर उतना भी बुरा नहीं था कि मैं बच नहीं सकती थी मुझे तो मेरे  ह्रदय के गर्भ में जन्मे प्रेम ने मार डाला जो तुम्हारे लिए था  |

झूठ और सच का प्रपंच

झूठ और सच्च के बिच का प्रपंच पढ़ने लायक तो  साक्षर हूं मैं  तुमने खामखां मुझे  अनपढ़ों की श्रेणी में  रखने की भुल कर डाली 

पितृसत्ता

समंदर ने पानी उधार लिया है  नदियों से  नदियां जब सूख रही होती हैं  समंदर नहीं लौटता है नदियों के हिस्से का जल !  समंदर न्याय नहीं करता  नदियों के साथ जैसे पिता नहीं करते न्याय अपनी  बेटियों से !

उसे हर कोई नकार रहा था

इसलिए नहीं कि वह बेकार था  इसलिए कि वह  सबके राज जानता था  सबकी कलंक कथाओं का  वह एकमात्र गवाह था  किसी के भी मुखोटे से वह वक्त बेवक्त टकरा सकता था  इसीलिए वह नकारा गया  सभाओं से  मंचों से  उत्सवों से  पर रुको थोड़ा  वह व्यक्ति अपनी झोली में कुछ बुन रहा है शायद लोहे के धागे से बिखरे हुए सच को सजाने की  कवायद कर रहा है उसे देखो वह समय का सबसे ज़िंदा आदमी है।

आश्वस्त हूँ

..... जब जब मारी गई नदियां  तब तब नदी की देह पर उगी   पपड़ियों के इतिहास को देख  कई रातों तक सोई नहीं यह धरती  देखे उसने कितने ही अंतिम संस्कार  नदी की देह पर उगे विश्वासों के सदियाँ बीत गईं और औरतों के गर्भ से  मनुजों ने इस भूमि पर  स्थापित किया अपना साम्राज्य  पर वे जरा भी विचलित न हुए   उसी भूमि के नित्य होते गर्भपातों से रोज एक नए युद्ध की नीव पड़ रही  बारूदी सुरंगें धरती की कोख तक पहुँच रही तुम क्षमा मत करना धरती माँ  कि हम भर रहे हैं तेरा आंचल बारुद से  कि हम भर रहे हैं तेरी कोख तेजाब से  अंधाधुंध फैलते विकास के कारखाने  गला रहे तेरी काया रोज-ब-रोज मेरी कविताएँ उदास और अकेली हैं  कि एक दृश्य उभरकर आता है  कि उसे शब्दों का पोशाक पहनाकर  मैं चीखती हूं - अब बस करो मैं नहीं जानती मेरी चीखें किन पातालों और खोहों से गुजरती हैं नहीं जानती कहाँ तक पहुँच रही है मेरी आवाज लेकिन आश्वस्त हूँ शब्द बचे हैं जब तक हमारे सीने में  बची रहेगी यह धरती भी।

हिसाब नमक का

दिसंबर के जाने से  या फिर जनवरी के आने से  फरवरी के ठहरने से  भी क्या होगा  ? भाग्य में लिखा है  तुम्हारा न मिलना  और मेरा न लौटना कैलेंडर केवल कुछ पन्नों का महज एक दस्तावेज है मेरे लिए जिसकी हर तारिख पे नमक का हिसाब आज भी बाकी है

नवस्वप्न

              रविवार का दिन था। हर रविवार येल्लापुर में बाजार लगता। सुबह से ही बाजार में चलह कदमी होने लगी। सौदा बेचने वालों के चेहरे पर मुस्कान थी। नफा या नुकसान का भाव अभी तक चेहरे पर नहीं उभरा था। उभरेगा, सूरज के सिर पर चढ़ने तक। बीच सड़क पर टेंपो, ट्रक रुके थे, जो हुबली, गदग से सब्जियां, फल ,फूल  लेकर आए थे। मजदूर बड़ी-बड़ी सब्जियों की टोकरी और गट्ठर ढो रहे थे। लंबे कद काठी वाले मजदूर बड़े-बड़े कदमों से रास्ता नाप रहे थे। वहीं  छोटे कद वाले मजदूरों को देखकर लगता था वे आगे कम पीछे ज्यादा चल रहे हैं। मानो वहीं रुके - रुके से हों। इसी बीच आसपास के गांव से सब्जी फल लेकर आई औरतें सड़क किनारे सौदा बेचने के लिए जगह छेंकने लगीं। वहाँ एक तनातनी हमेशा मची रहती थी, बाहर से आकर व्यापार करने वाली औरतें और इसी शहर या फिर आसपास के गांव की औरतों के बीच। कभी-कभी मामला इतना बिगड़ जाता था कि क्लेश शुरू हो जाता और वे सड़क के बीचोबीच झोंटा पकड़कर या कपड़े फाड़ कर हंगामा करने लगती । मामला बिगड़ने पर बाजार के चौक का पुलिस आकर अ...

संवाद से समाधि तक

तुम चले गए हो और मेरे पास जो बचा है वो केवल गुजरे समय की एक समाधि है जिस पर रोज सुबह फुल विश्राम करते हैं और रात में अंतिम निद्रा में लीन हो जाते हैं और मेरे आंखों के जलाशय में रक्त वर्णी फुल फिर जन्म लेते हैं फिर मुरझा जाते हैं और कुछ इस तरह मेरा प्रेम संवाद से समाधि तक के महाप्रस्थान की ओर बढ़ रहा है

तना हुआ वृक्ष

तुम देख रही हो ना नदी के तट पर नारियल के तने हुए वृक्ष असंख्य वे खड़े रहते हैं नदी के लिए हर अच्छे-बुरे मौसम में होना चाहता हूं मैं भी नारियल का वह वृक्ष खड़ा /झूमता /तना हुआ तुम्हारे लिए जीवन के सभी मौसम में तुम बनो नदी म ैं  बनूं नारियल का वृक्ष झूमता हुआ / तना  हुआ २३/०१/२०१७

अलगाव

अलगाव ये शब्द  एक अरसे से चल रहा है  मेरे साथ  यदाकदा आंखों से  बहता ही रहता है  आज सोचती हूंँ  इतनी बार ये शब्द  मेरी आंसुओं में बहा है  फिर भी इसका अस्तित्व  क्यों नहीं मिट रहा है ? हर रिश्ते में ये शब्द  इतनी शिद्दत के साथ  क्यों अपनी जगह बन जाता है शायद जिस दिन मैं  पूर्ण रूप से  टूट वृक्ष बन मिट्टी से उखड़ कर  मिटने की प्रार्थना करूंगी  उस ईश से उस  दिन ये  मेरे साथ ही दफ़न होगा  जब सांसें छोड़ देगी देह का साथ उस दिन मैं बिदा हो जाऊगी अंतिम इच्छा के साथ उम्रभर जीया जिन जिन  अपनों से अलगाव का दुख उनके आंखों से एक भी आंसू न बहे मेरे अलगाव में...  मृत्यु संवाद नहीं करती है

हत्यारे

हम मरते नहीं  मारे जाते हैं  सिद्धांत से खाली समय  और अवसरवादी भीड़ के हाथों तुम्हें क्या लगता है  मनुष्य आत्महत्या करता है  नहीं, ये शब्द केवल म्यान है  हत्या के ऊपर चढ़ाई हुई ।

औरत की जात बिकाऊ नहीं है

किसी औरत का प्रेम  दिहाड़ी समझकर  मत भोगना सामने से गुजरती हर औरत को देख तुम्हारी ये जो जुबान मोल-भाव की भाषा पर उतर आती है ना वेश्यावृत्ति एक धंधा है  औरत की जात बिकाऊ नहीं होती है  ।