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कुर्सी

कुछ लोग कुर्सी के उपर बैठे हैं
कुछ लोग कुर्सी के नीचे बैठे हैं
कुछ लोगों ने कुर्सी को घेर रखा है
कुछ लोग उचककर बस कुर्सी को  ताक रहे हैं
और एक भीड़ ऐसी भी है
जिसने कभी कुर्सी देखी ही नहीं है
पर कुर्सी के ढांचे में जो कील ठोकी गई है
वो इसी भिड़ के पसीने का लोहा है
 देखना है भीड़ कुर्सी को कब देखेगी
 जब कुर्सी से कील अलग हो जाएगी तब
या  जब इस कुर्सी पे बैठे व्यक्ति का जमीर जाग जायेगा

टिप्पणियाँ

  1. भीड़ के हाथ तो नहीं आने वाली ही कुर्सी ... कोई न कोई बैठ जाएगा इसपर कील घिस जाएगी अपनी जगह बनाते बनाते ...

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  2. कुर्सी ही की दुनिया है , जिसे मिल जाये तो वाह वाह न मिले तो हाय हाय ।

    रेखा श्रीवास्तव

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 16 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. सटीक राजनीतिक टिप्पणी
    बहुत सुंदर रचना

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