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सम्मान का सिंदूर

उन्ह बदनाम गलियों में
रोज शाम खडी होती है मजबुरी
तलाशती है चुल्हे की आग
गली के चौराहे पर
खड़ी हो जाने से पहले
वो खड़ी हो जाती है
आईने के सामने
लेकर अपना 
जख्मी देह तथा रक्तरंजित मन
करता है आईना भी
कभी कभी बेईमानी
दिखता है उस औरत को
आवरण के पीछे का अश्क 
वो मुँद लेती है आँखे
और तलाशती है खुद को
तभी समय का काँटा
चुभ जाता है आँखो में
प्रहरा कर जाता है आंतो पे
आँखो को खोलकर 
बंद करती है काजल से
वो मार्ग जहाँ से
अभी अभी उसने की थी कोशीश
खुद को तलाशने की
ग्राहक उसके होंठो को
रोज रंगाता है कालिख से
रोज वो उसे लेप देती है
पिढा की लाली से
वो सजाती है अपने माधे
प्रेम रहित लाल बिंदी
और तलाशती है रोज
खाली डिब्बीं में
थोडा सिदूंर सम्मान का

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रिश्ते

अपना खाली समय गुजारने के लिए कभी रिश्तें नही बनाने चाहिए |क्योंकि हर रिश्तें में दो लोग होते हैं, एक वो जो समय बीताकर निकल जाता है , और दुसरा उस रिश्ते का ज़हर तांउम्र पीता रहता है | हम रिश्तें को  किसी खाने के पेकट की तरह खत्म करने के बाद फेंक देते हैं | या फिर तीन घटें के फिल्म के बाद उसकी टिकट को फेंक दिया जाता है | वैसे ही हम कही बार रिश्तें को डेस्पिन में फेककर आगे निकल जाते हैं पर हममें से कही लोग ऐसे भी होते हैं , जिनके लिए आसानी से आगे बड़ जाना रिश्तों को भुलाना मुमकिन नहीं होता है | ऐसे लोगों के हिस्से अक्सर घुटन भरा समय और तकलीफ ही आती है | माना की इस तेज रफ्तार जीवन की शैली में युज़ ऐड़ थ्रो का चलन बड़ रहा है और इस, चलन के चलते हमने धरा की गर्भ को तो विषैला बना ही दिया है पर रिश्तों में हम इस चलन को लाकर मनुष्य के ह्रदय में बसे विश्वास , संवेदना, और प्रेम जैसे खुबसूरत भावों को भी नष्ट करके ज़हर भर रहे हैं  

दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

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