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हम अकेले जीते लोग

हम अकेले जीते लोग
जिनसे समय ने तकदीर ने
छीन लिया हमारे साथ चलते कदमों को

और बहाल कर दिया है
हमारे जीवन में रिक्तता
हमारी हथेलियों को नहीं होता है
कभी  स्पर्श किसी अन्य हथेलियों का

ना ही हमारे हिस्से आती हैं
वो सुबहे जिममें शामिल होता है
किसी के जगाने का मुलायम स्पर्श

न हीं देर रात तक दरवाजे पर
टिके रहते हैं किसी के कदम
हमारा इंतजार लेकर

हम अकेले जीते लोग
जो बेगुनाह होकर भी
गुनहगार बन सबकी
आंखों में प्रश्नचिन्ह बन जाते हैं

त्योहारों के बाजार में
हम खो जाते हैं लेकर अपना गम

हम बस उतने ही जिंदा रहते हैं
जितनी हमारे कंधों पर
जिम्मेदारियों का वजन रहता है

हमारे शौक हमारी पसंद नापसंद
इसका ख्याल कोही नहीं रखता
और एक दिन हम ही भूल जाते हैं
हम क्या चाहते हैं क्या नहीं

हम अकेले जीते लोग
रात में करवट बदलने से भी
डरते हैं
तारों से भरे आसमान में
धरा पर लेकर तन्हाई हम
अपने आप से सिमट कर सोते हैं

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रिश्ते

अपना खाली समय गुजारने के लिए कभी रिश्तें नही बनाने चाहिए |क्योंकि हर रिश्तें में दो लोग होते हैं, एक वो जो समय बीताकर निकल जाता है , और दुसरा उस रिश्ते का ज़हर तांउम्र पीता रहता है | हम रिश्तें को  किसी खाने के पेकट की तरह खत्म करने के बाद फेंक देते हैं | या फिर तीन घटें के फिल्म के बाद उसकी टिकट को फेंक दिया जाता है | वैसे ही हम कही बार रिश्तें को डेस्पिन में फेककर आगे निकल जाते हैं पर हममें से कही लोग ऐसे भी होते हैं , जिनके लिए आसानी से आगे बड़ जाना रिश्तों को भुलाना मुमकिन नहीं होता है | ऐसे लोगों के हिस्से अक्सर घुटन भरा समय और तकलीफ ही आती है | माना की इस तेज रफ्तार जीवन की शैली में युज़ ऐड़ थ्रो का चलन बड़ रहा है और इस, चलन के चलते हमने धरा की गर्भ को तो विषैला बना ही दिया है पर रिश्तों में हम इस चलन को लाकर मनुष्य के ह्रदय में बसे विश्वास , संवेदना, और प्रेम जैसे खुबसूरत भावों को भी नष्ट करके ज़हर भर रहे हैं  

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