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गाँव

बहुत से गांव इसलिए भी बचे हैं
क्योंकि गांवों में माये जिंदा है
और अक्सर शहर महानगर
कभी कभार  बड़े भारी मन से
वहां हो आते हैं

नहीं तो अब कम ही लगती हैं
महानगरों की मिट्टी
गांव के सड़कों पर

एक समय यह भी था गांवों में
कोई भी राह गुजरता
बिढे पर बैठ
भागीदार बन जाता था
बटुले के अन्न का
पर अब डोरबेल बजने पर
अविश्वास की आंखें
दरवाजे से झांकती हैं

गांवों से हम शहरी
सब कुछ लेकर आए
श्रम का पसीना पोछने गमछा
पेट के भीतर की अतडिया
पर ओसारें पे बैठा भाईचारा
और बिना ताले के दरवाजे़ का भरोसा
तथा पूर्वजों की सभ्यता की डिबरियां
हम लाना  भूल गए

अब भी बहुत से शहर महानगर
इसलिए भी गांव की तरफ मुड़ते हैं
क्योंकि वहां पर पुश्तैनी जायदाद बची हैं

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रिश्ते

अपना खाली समय गुजारने के लिए कभी रिश्तें नही बनाने चाहिए |क्योंकि हर रिश्तें में दो लोग होते हैं, एक वो जो समय बीताकर निकल जाता है , और दुसरा उस रिश्ते का ज़हर तांउम्र पीता रहता है | हम रिश्तें को  किसी खाने के पेकट की तरह खत्म करने के बाद फेंक देते हैं | या फिर तीन घटें के फिल्म के बाद उसकी टिकट को फेंक दिया जाता है | वैसे ही हम कही बार रिश्तें को डेस्पिन में फेककर आगे निकल जाते हैं पर हममें से कही लोग ऐसे भी होते हैं , जिनके लिए आसानी से आगे बड़ जाना रिश्तों को भुलाना मुमकिन नहीं होता है | ऐसे लोगों के हिस्से अक्सर घुटन भरा समय और तकलीफ ही आती है | माना की इस तेज रफ्तार जीवन की शैली में युज़ ऐड़ थ्रो का चलन बड़ रहा है और इस, चलन के चलते हमने धरा की गर्भ को तो विषैला बना ही दिया है पर रिश्तों में हम इस चलन को लाकर मनुष्य के ह्रदय में बसे विश्वास , संवेदना, और प्रेम जैसे खुबसूरत भावों को भी नष्ट करके ज़हर भर रहे हैं  

दु:ख

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