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क्षणिकाएं

१.

बेलपत्र पर जब मैं
तुम्हारी प्रतिक्षा लिखकर
महादेव को अर्पण कर रही थी
ठीक उसी समय
दूर किसी वृक्ष पर एक चिड़िया
मिलन के बाद बिच्छड़ने का
गम गा रही थी ।

२.

मुझे बिहड़ में बिठाकर
मेरे सपनें मलबें में तब्दील कर
तुम चाहते हो मेरी कलम से
रंगीन तितलियों की
उन्मुक्त उड़ान मैं लिखूं ?


३.

कागज पर उतारी कविता
दुनिया पढ़ती है
पर पूर्णवीराम के बाद
कलम जो बिंदू उकेरती है
उसमें मेरे जीवन का सफर होता है
जिसे केवल तुम पढ़ सकते हो

४.

कुछ ने चाहा 
मैं खामोश रहूं
मैं खामोश रही
पर मेरी कलम
गुस्ताख़ी कर गयी ।

टिप्पणियाँ

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(२८-१०-२०२१) को
    'एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ'(चर्चा अंक-४२३०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर सारगर्भित क्षणिकाएं ।

    जवाब देंहटाएं
  3. पीड़ा को शालीनता से लिखा है आपने ,पर विरह का दर्द उजागर है।सृजन में।
    अभिनव सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  4. कलम की इसी गुस्ताखी ने खामोश रहने की शक्ति दी ...अब चन्द लोगों के लिए खामोश रहकर दुनिया से बतिया रही है लेखनी...
    लाजवाब सृजन
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं

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अपना खाली समय गुजारने के लिए कभी रिश्तें नही बनाने चाहिए |क्योंकि हर रिश्तें में दो लोग होते हैं, एक वो जो समय बीताकर निकल जाता है , और दुसरा उस रिश्ते का ज़हर तांउम्र पीता रहता है | हम रिश्तें को  किसी खाने के पेकट की तरह खत्म करने के बाद फेंक देते हैं | या फिर तीन घटें के फिल्म के बाद उसकी टिकट को फेंक दिया जाता है | वैसे ही हम कही बार रिश्तें को डेस्पिन में फेककर आगे निकल जाते हैं पर हममें से कही लोग ऐसे भी होते हैं , जिनके लिए आसानी से आगे बड़ जाना रिश्तों को भुलाना मुमकिन नहीं होता है | ऐसे लोगों के हिस्से अक्सर घुटन भरा समय और तकलीफ ही आती है | माना की इस तेज रफ्तार जीवन की शैली में युज़ ऐड़ थ्रो का चलन बड़ रहा है और इस, चलन के चलते हमने धरा की गर्भ को तो विषैला बना ही दिया है पर रिश्तों में हम इस चलन को लाकर मनुष्य के ह्रदय में बसे विश्वास , संवेदना, और प्रेम जैसे खुबसूरत भावों को भी नष्ट करके ज़हर भर रहे हैं  

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