सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्षणिकाएं

१)

अनगिनत वृक्ष
दुनिया भर की अलमारियों में
बैठे हैं मौन
और दीमकें जता रही हैं
उन पर अपना हक।

२)

संमदर में रोती हुई मछलीयां 
सीप में रख देती हैं 
अपने आंसूओं को 
जो मोती बन चमकते हैं 
धरती के गालों पर

३)

हर पार्वती के हिस्से 
नहीं होते शिव 
फिर भी वो अर्द्धनारीश्वर के रूप में
विचरती रहती है इस धरा पर !


४)

मैं तुम्हारे आंगन कि कृष्ण तुलसी बनकर 
तुम्हारे ललाट पर स्थित 
समस्त कठिन रेखाएं खींच कर 
भस्म कर अपने देह के अंदर धर लूंगी

५)

हम दोनों के प्रेम में स्थित अधूरापन
तुम्हारे लौटने की परिभाषा है


टिप्पणियाँ

  1. सुंदर क्षणिकाओं का अनूठा सृजन।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर औऱ भावपूर्ण क्षणिकाएं
    बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. संमदर में रोती हुई मछलीयां
    सीप में रख देती हैं
    अपने आंसूओं को
    जो मोती बन चमकते हैं
    धरती के गालों पर
    ..."
    ...........अहा...वाह! प्रकृति के साथ कितना सुन्दर तरिके से संबंध बनाकर इन पंक्तियों को प्रस्तुत किया है। इनके भाव सीधे हृदय को स्पर्श कर गयें। बहुत ही बेहतरीन रचना।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रिश्ते

अपना खाली समय गुजारने के लिए कभी रिश्तें नही बनाने चाहिए |क्योंकि हर रिश्तें में दो लोग होते हैं, एक वो जो समय बीताकर निकल जाता है , और दुसरा उस रिश्ते का ज़हर तांउम्र पीता रहता है | हम रिश्तें को  किसी खाने के पेकट की तरह खत्म करने के बाद फेंक देते हैं | या फिर तीन घटें के फिल्म के बाद उसकी टिकट को फेंक दिया जाता है | वैसे ही हम कही बार रिश्तें को डेस्पिन में फेककर आगे निकल जाते हैं पर हममें से कही लोग ऐसे भी होते हैं , जिनके लिए आसानी से आगे बड़ जाना रिश्तों को भुलाना मुमकिन नहीं होता है | ऐसे लोगों के हिस्से अक्सर घुटन भरा समय और तकलीफ ही आती है | माना की इस तेज रफ्तार जीवन की शैली में युज़ ऐड़ थ्रो का चलन बड़ रहा है और इस, चलन के चलते हमने धरा की गर्भ को तो विषैला बना ही दिया है पर रिश्तों में हम इस चलन को लाकर मनुष्य के ह्रदय में बसे विश्वास , संवेदना, और प्रेम जैसे खुबसूरत भावों को भी नष्ट करके ज़हर भर रहे हैं  

दु:ख

काली रात की चादर ओढ़े  आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा  कुछ ऐसा ही आभास होता है  जैसे दु:ख के घेरे में फंसा  सुख का एक लम्हां  दुख़ क्यों नहीं चला जाता है  किसी निर्जन बियाबांन में  सन्यासी की तरह  दु:ख ठीक वैसे ही है जैसे  भरी दोपहर में पाठशाला में जाते समय  बिना चप्पल के तलवों में तपती रेत से चटकारें देता   कभी कभी सुख के पैरों में  अविश्वास के कण  लगे देख स्वयं मैं आगे बड़कर  दु:ख को गले लगाती हूं  और तय करती हूं एक  निर्जन बियाबान का सफ़र

क्षणिकाएँ

1. धुएँ की एक लकीर थी  शायद मैं तुम्हारे लिये  जो धीरे-धीरे  हवा में कही गुम हो गयी 2. वो झूठ के सहारे आया था वो झूठ के सहारे चला गया यही एक सच था 3. संवाद से समाधि तक का सफर खत्म हो गया 4. प्रेम दुनिया में धीरे धीरे बाजार की शक्ल ले रहा है प्रेम भी कुछ इसी तरह किया जा रहा है लोग हर चीज को छुकर दाम पूछते है मन भरने पर छोड़कर चले जाते हैं