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नदी

नदी तू सींचती है 
सदा ही सभी को अपने मीठे जल से
जबकि तुम्हारे हिस्से में
आता रहा है हमेशा से
बड़े बड़े पत्थरों ने दिये
नुकीले असहनीय दर्द
तू बड़ी माहिर है छुपाने में 
रक्तरंजित बदन को
जिन्हे तुम छिपा लेती हो
बड़ी ही खूबसूरती से  
भूलकर रक्तरंजित बदन की पीड़ा
सौंप देती हो खुद को
संमदर के मजबूत बाहुपाश में
और खो जाती हो 
चुपचाप संमदर के खारे सीने में
और युगों के बाद समंदर का नमक 
जब कुरेदता है 
बार -बार तुम्हारे जख्मों को
और उसमें भर देता है तुम्हारी 
मरणसन्न पीड़ा को
फिर भी शान्त रह सहती हो
बगैर कुछ कहे हुए
परन्तु हे नदी तुझसे पूंछ्ती हूँ
नदी सी आखिर तुम्हारे अवदान का 
तुम्हे आज तक क्या प्रतिफल मिल सका है
जो आज भी तुम
हृदय की गहनता में छुपाये हुए
बिना रूके बहती चली जा रही हो
निर्लिप्त भाव से




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रिश्ते

अपना खाली समय गुजारने के लिए कभी रिश्तें नही बनाने चाहिए |क्योंकि हर रिश्तें में दो लोग होते हैं, एक वो जो समय बीताकर निकल जाता है , और दुसरा उस रिश्ते का ज़हर तांउम्र पीता रहता है | हम रिश्तें को  किसी खाने के पेकट की तरह खत्म करने के बाद फेंक देते हैं | या फिर तीन घटें के फिल्म के बाद उसकी टिकट को फेंक दिया जाता है | वैसे ही हम कही बार रिश्तें को डेस्पिन में फेककर आगे निकल जाते हैं पर हममें से कही लोग ऐसे भी होते हैं , जिनके लिए आसानी से आगे बड़ जाना रिश्तों को भुलाना मुमकिन नहीं होता है | ऐसे लोगों के हिस्से अक्सर घुटन भरा समय और तकलीफ ही आती है | माना की इस तेज रफ्तार जीवन की शैली में युज़ ऐड़ थ्रो का चलन बड़ रहा है और इस, चलन के चलते हमने धरा की गर्भ को तो विषैला बना ही दिया है पर रिश्तों में हम इस चलन को लाकर मनुष्य के ह्रदय में बसे विश्वास , संवेदना, और प्रेम जैसे खुबसूरत भावों को भी नष्ट करके ज़हर भर रहे हैं  

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