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प्रेम का तर्पण

प्रेम का तर्पण

कब के बिछडे थे
बस रस्में बाकी हैं 
अब उनका समापन कर दूँ 
अपने सपने जो उलझे हैं
सुलझाकर वापस कर दूँ 
तनिक ठहर जाना  ।

बचपन की वो मीठी यादों से
नाता तोड़ के जाना 
यौवन की दहलीज से
नयनो को भी मोड़ के जाना 
तनिक ठहर जाना

संदूक खोल लूँ 
अर्पित कर दूँ फूलों की
अस्थियाँ
ज़रा जलार्पण कर दूं 
अश्रू जल से नहाये पत्र
तथा उसमें लुप्त वर्ण
समीर संग झुलाकर वापस कर दूँ 
तनिक ठहर जाना

जिन शब्दों और कदमों से
परिचय था हमारा
उनके मन को जरा
तसल्ली दे जाना 
तनिक ठहर जाना

बिछुड़ कर भी जो है पाना
हारकर भी जो है जीतना
आत्मा को अर्पण कर लूँ
साँसों का तर्पण कर लूँ
तनिक ठहर जाना ।

टिप्पणियाँ

  1. Bahut khoob likha hai
    https://yourszindgi.blogspot.com/2020/05/blog-post_29.html?m=0

    जवाब देंहटाएं
  2. साँसों का तर्पण कर लूँ
    तनिक ठहर जाना ।
    बढ़िया !

    जवाब देंहटाएं

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