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शैल पुत्री

शैल पुत्री सरिता मैं
निर्झर बहती रहती हूँ
हर चट्टानों को
हर सीमाओं को
मैं लाँघती रहती हूँ

नगर-नगर डगर-डगर
जीवन भरती रहती हूँ
जन-जन के उर में
नव प्राण भरती रहती हूँ

जहाँ जहाँ से गुजरी मैं
वहाँ-वहाँ जन्मी सभ्यता
जहाँ जहाँ ठहरी मैं
वहाँ-वहाँ बसी मानवता

नदी हूँ चलते रहना मुझे
रूके कभी ना मेरे पांव
ढूँढ रही मैं एक किनारा
बने जो एक मेरा ठांव

यात्रा मेरी जीवन सी, मिली
अवेहलना हर्ष-दुत्कार सभी
स्री जीवन है ही ऐसी
हर भाव मुझे स्विकार अभी

जब जब समाज ने चाहा
धो दूँ उनके पापों का अंकुर
समझा उनको मैने,
जीवन यह नश्वर क्षणभंगुर

शैल पुत्री सरिता मैं
निर्झर बहती रहती हूँ

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति :)

    वक़्त मिले तो हमारे ब्लॉग पर भी आयें|
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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रिश्ते

अपना खाली समय गुजारने के लिए कभी रिश्तें नही बनाने चाहिए |क्योंकि हर रिश्तें में दो लोग होते हैं, एक वो जो समय बीताकर निकल जाता है , और दुसरा उस रिश्ते का ज़हर तांउम्र पीता रहता है | हम रिश्तें को  किसी खाने के पेकट की तरह खत्म करने के बाद फेंक देते हैं | या फिर तीन घटें के फिल्म के बाद उसकी टिकट को फेंक दिया जाता है | वैसे ही हम कही बार रिश्तें को डेस्पिन में फेककर आगे निकल जाते हैं पर हममें से कही लोग ऐसे भी होते हैं , जिनके लिए आसानी से आगे बड़ जाना रिश्तों को भुलाना मुमकिन नहीं होता है | ऐसे लोगों के हिस्से अक्सर घुटन भरा समय और तकलीफ ही आती है | माना की इस तेज रफ्तार जीवन की शैली में युज़ ऐड़ थ्रो का चलन बड़ रहा है और इस, चलन के चलते हमने धरा की गर्भ को तो विषैला बना ही दिया है पर रिश्तों में हम इस चलन को लाकर मनुष्य के ह्रदय में बसे विश्वास , संवेदना, और प्रेम जैसे खुबसूरत भावों को भी नष्ट करके ज़हर भर रहे हैं  

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